विश्लेषकों के मुताबिक अमेरिकी राजनयिक ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के साथ अपने को अधिक सहज पा रहे हैं। इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि ईयू के सदस्य कई देशों के चीन के साथ निकट व्यापार संबंध हैं। वे देश अमेरिका के लिए अपने व्यापारिक फायदों की बलि नहीं चढ़ा सकते। चीन के खिलाफ गठबंधन बनाने की जो बाइडन की अपील को फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, और इटली कई बार ठुकरा चुके हैं। पिछले हफ्ते ईयू के विदेश मामलों के प्रमुख जोसेप बॉरेल ने कहा था कि ईयू चीन के साथ टकराव के बजाय सहयोग के रास्ते पर चलना चाहता है।
एथेंस स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल इकॉनमिक रिलेशन्स में एशियाई मामलों के प्रमुख प्लामेन तोनचेव ने निक्कई एशिया से कहा- ‘सच यह है कि ईयू के सदस्य 27 देशों के चीन के बारे में अलग-अलग 27 विचार हैं।’ 2019 में जारी ईयू के स्ट्रेटेजिक आउटलुक में चीन को ‘सहभागी, प्रतिस्पर्धी, और प्रतिद्वंद्वी’ बताया गया था। तोनचेव ने कहा- ‘अमेरिका चीन को प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखता है, जबकि ईयू की राय लचीली है। जिस समय अमेरिका का मूड बदल रहा है, ईयू चीन के प्रति उसकी इच्छा के मुताबिक टकराव के लिए तैयार नहीं है।’
फ्रेडरिक ग्रेयर के मुताबिक एक तरफ अमेरिका चाहता है कि ईयू इंडो-पैसिफिक में अधिक भूमिका निभाए। लेकिन जब ईयू कुछ करना चाहता है, तो वह उसे हाशिये पर डाल देता है। इससे ईयू में इस सवाल पर भ्रम बन गया है कि आखिर अमेरिका का सहयोगी होने का मतलब क्या है।