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विदेश में आरक्षण: अमेरिकी विश्वविद्यालयों में 'अफरमेटिव एक्शन' पॉलिसी के खत्म होने का अंदेशा, एडमिशन मिलना होगा मुश्किल

Mon, 23 Aug 2021 03:20 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन

सार

जानकारों का कहना है कि अगर अफरमेटिव एक्शन की नीति को बदल दिया गया, तो ब्लैक और कई दूसरे समुदायों के छात्रों के लिए उच्च शिक्षा तक पहुंच पाना कठिन हो जाएगा। उस हाल में उच्च शिक्षा संस्थानों में श्वेत और एशियाई छात्रों का दबदबा कायम हो जाएगा...
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हावर्ड यूनिवर्सिटी - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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अमेरिकी विश्वविद्यालयों में अफरमेटिव एक्शन (सकारात्मक पहल, जिसके तहत अश्वेत छात्रों के लिए आरक्षण का प्रावधान है) खतरे में है। इस पहल के कारण बीते 60 वर्षों में अमेरिकी विश्वविद्यालयों में ब्लैक और दूसरे अश्वेत छात्रों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई। लेकिन अब हार्वर्ड यूनिवर्सिटी का एक मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है। कुछ हलकों से आशंका जताई गई है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले अफरमेटिव एक्शन की छह दशक पुरानी नीति को पलटने या बदलने का आदेश दे सकता है।

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कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर माइकल चांग ने वेबसाइट एक्सियोस.कॉम से कहा कि मुमकिन है कि सुप्रीम कोर्ट नस्ल आधारित प्राथमिकता देने के बजाय विश्वविद्यालयों में विभिन्नता बढ़ाने के दूसरे उपाय अपनाने का आदेश दे। जिस एक संभावित उपाय की चर्चा है, वह यह है कि कॉलेजों को धनी और गरीब छात्रों को समान संख्या में दाखिला देने का आदेश दिया जाएगा।

वेबसाइट एक्सियोस के लिए इस्पोस एजेंसी के एक ताजा सर्वे से सामने आया है कि अमेरिका में जो छात्र कॉलेज या पोस्ट ग्रैजुएट कोर्स में दाखिला लेते हैं, उनमें 70 फीसदी का मकसद जीवन में पेशेवर और वित्तीय रूप से कामयाब होना रहता है। अश्वेत लोगों के लिए सिर्फ शिक्षा ही वो जरिया है, जिससे वे धन की गैर-बराबरी से उबर पाते हैं।
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जानकारों का कहना है कि अगर अफरमेटिव एक्शन की नीति को बदल दिया गया, तो ब्लैक और कई दूसरे समुदायों के छात्रों के लिए उच्च शिक्षा तक पहुंच पाना कठिन हो जाएगा। उस हाल में उच्च शिक्षा संस्थानों में श्वेत और एशियाई छात्रों का दबदबा कायम हो जाएगा। कई विश्वविद्यालयों में अफरमेटिव एक्शन की नीति को पहले ही खत्म कर दिया गया है। मसलन, कैलिफॉर्निया यूनिवर्सिटी में 1990 के दशक में ही यूनिवर्सिटी के भीतर कराए गए एक मतदान के बाद ये नीति खत्म कर दी गई थी।

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अमेरिकी मीडिया में छपे अध्ययनों के मुताबिक कैलिफॉर्निया यूनिवर्सिटी के उस कदम का प्रभाव तुरंत देखा गया। वहां श्वेत और लैटिनो (लैटिन अमेरिका से आए लोगों) समुदाय के छात्रों की संख्या में भारी गिरावट आई। खास कर ऐसा बर्कले और लॉस एंजिल्स में स्थित नामी कॉलेजों में देखने को मिला। अब वहां ज्यादातर श्वेत या एशियाई समुदायों के ही छात्र दिखते हैं।

अध्ययनों के मुताबिक दाखिले के लिए जो इम्तहान लिया जाता है, उनमें ब्लैक, लैटिनो और मूलवासी अमेरिकी समुदाय के छात्रों के पास होने की संभावना श्वेत और एशियाई छात्रों की तुलना में कम रहती है। इसकी वजह यह है कि ऐसे छात्र ज्यादातर कम संसाधन वाले स्कूलों से पढ़ कर आए हुए होते हैं। उनकी तुलना में इन दाखिला परीक्षाओं में पूर्वी और दक्षिण एशियाई छात्रों के पास होने की संभावना ज्यादा रहती है।

कई अध्ययनों से ये सामने आया है कि ब्लैक, लैटिनो, और मूलवासी अमेरिकी समुदायों के छात्र पहले अपने निवास स्थान के आसपास के सरकारी कॉलेजों में दाखिला लेने की कोशिश करते हैं। लेकिन हाल के दशकों में सरकारी कॉलेजों में पढ़ाई भी पहले की तुलना में तीन से चार गुना ज्यादा महंगी हो गई है। जबकि बीते 30 साल में गरीब परिवारों की आय में औसतन 21 फीसदी की बढ़ोतरी ही हुई है।

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि पिछड़े समुदायों के छात्रों के लिए अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा हासिल करने का एक मात्र जरिया अफरमेटिव एक्शन नीति है। इसे खत्म करने का मतलब देश में गैर-बराबरी को बढ़ाना होगा।
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