अमेरिकी मीडिया में छपे अध्ययनों के मुताबिक कैलिफॉर्निया यूनिवर्सिटी के उस कदम का प्रभाव तुरंत देखा गया। वहां श्वेत और लैटिनो (लैटिन अमेरिका से आए लोगों) समुदाय के छात्रों की संख्या में भारी गिरावट आई। खास कर ऐसा बर्कले और लॉस एंजिल्स में स्थित नामी कॉलेजों में देखने को मिला। अब वहां ज्यादातर श्वेत या एशियाई समुदायों के ही छात्र दिखते हैं।
अध्ययनों के मुताबिक दाखिले के लिए जो इम्तहान लिया जाता है, उनमें ब्लैक, लैटिनो और मूलवासी अमेरिकी समुदाय के छात्रों के पास होने की संभावना श्वेत और एशियाई छात्रों की तुलना में कम रहती है। इसकी वजह यह है कि ऐसे छात्र ज्यादातर कम संसाधन वाले स्कूलों से पढ़ कर आए हुए होते हैं। उनकी तुलना में इन दाखिला परीक्षाओं में पूर्वी और दक्षिण एशियाई छात्रों के पास होने की संभावना ज्यादा रहती है।
कई अध्ययनों से ये सामने आया है कि ब्लैक, लैटिनो, और मूलवासी अमेरिकी समुदायों के छात्र पहले अपने निवास स्थान के आसपास के सरकारी कॉलेजों में दाखिला लेने की कोशिश करते हैं। लेकिन हाल के दशकों में सरकारी कॉलेजों में पढ़ाई भी पहले की तुलना में तीन से चार गुना ज्यादा महंगी हो गई है। जबकि बीते 30 साल में गरीब परिवारों की आय में औसतन 21 फीसदी की बढ़ोतरी ही हुई है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि पिछड़े समुदायों के छात्रों के लिए अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा हासिल करने का एक मात्र जरिया अफरमेटिव एक्शन नीति है। इसे खत्म करने का मतलब देश में गैर-बराबरी को बढ़ाना होगा।