राजस्थान के डीडवाना-कुचामन जिले में सरकारी दफ्तरों की कार्यसंस्कृति पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। प्रशासनिक सुधार एवं समन्वय विभाग (ARD) की राज्य स्तरीय टीम ने सोमवार सुबह 9:40 बजे जिला मुख्यालय स्थित 14 प्रमुख सरकारी कार्यालयों में औचक निरीक्षण किया। निरीक्षण का नेतृत्व शासन उप सचिव एवं अतिरिक्त निदेशक सुनील कुमार शर्मा ने किया।
निरीक्षण के दौरान कलेक्ट्रेट से लेकर अस्पताल तक अनुशासनहीनता की तस्वीर सामने आई। सबसे चौंकाने वाला मामला तब सामने आया जब जिला कलेक्टर महेंद्र कुमार खड़गावत निरीक्षण के समय कार्यालय में अनुपस्थित पाए गए। वहीं अतिरिक्त जिला कलेक्टर (एडीएम) मोहनलाल खटनावलिया भी पिछले तीन दिनों से कार्यालय नहीं आ रहे थे। टीम ने टिप्पणी की कि जब शीर्ष अधिकारी ही समय पर उपस्थित नहीं रहते, तो आमजन की समस्याओं की सुनवाई कैसे संभव होगी।
निरीक्षण दल जब सार्वजनिक निर्माण विभाग (PWD) कार्यालय पहुंचा, तो मुख्य द्वार पर ताला लटका मिला। परिवहन विभाग (DTO) की स्थिति और भी गंभीर रही, जहां 11 में से 10 कर्मचारी ड्यूटी से नदारद पाए गए। यहां पदस्थ मोटर वाहन निरीक्षक (MVI) कर्णाराम बिश्नोई भी 2 जनवरी से लगातार अनुपस्थित चल रहे हैं। इसी तरह अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (AVVNL) के कार्यालय में अधिकारी के कक्ष पर भी ताला मिला।
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राजकीय अस्पताल के निरीक्षण में भी व्यवस्थाएं लचर मिलीं। मरीजों ने दवाइयां नहीं मिलने की शिकायत की। अस्पताल परिसर में गंदगी पाई गई और ड्यूटी पर मौजूद चिकित्सक निर्धारित ड्रेस कोड में नहीं थे। इस पर टीम ने पीएमओ को कड़ी फटकार लगाते हुए तुरंत सुधार के निर्देश दिए। निरीक्षण के दौरान कुल 35 हाजिरी रजिस्टरों की जांच की गई। इनमें राजपत्रित अधिकारी 77 में से 47 अनुपस्थित (61.03%) अराजपत्रित कर्मचारी 307 में से 184 अनुपस्थित (59.93%)
निरीक्षण दल के मुखिया सुनील कुमार शर्मा ने बताया कि डीडवाना मुख्यालय की स्थिति चिंताजनक है। ऐसा प्रतीत होता है कि जिला स्तर पर प्रशासनिक नियंत्रण प्रभावी नहीं है। सभी हाजिरी रजिस्टर जब्त कर लिए गए हैं और अनुपस्थित कार्मिकों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश के साथ रिपोर्ट जयपुर मुख्यालय भेजी जा रही है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आगे केवल सुबह ही नहीं, बल्कि लंच के बाद भी औचक निरीक्षण किए जाएंगे, ताकि हाजिरी लगाकर कार्यालय से गायब होने की प्रवृत्ति पर लगाम लगाई जा सके। यह मामला राजस्थान में सरकारी कार्यालयों की कार्यसंस्कृति और जवाबदेही पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।