बिहार में दमदार प्रदर्शन के बाद… क्या बंगाल में फेल हो गई Asaduddin Owaisi की सियासत? मुस्लिम बहुल सीटों पर पूरी ताकत झोंकने के बावजूद… क्यों नहीं खुल पाया All India Majlis-e-Ittehadul Muslimeen का खाता? क्या Humayun Kabir के साथ टूटा गठबंधन बना सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट? और क्या एंटी-बीजेपी वोटों के बंटवारे का आरोप इस बार उल्टा पड़ गया?
कांडी सीट पर थोड़ी राहत… लेकिन बाकी जगह क्यों सिमट गई AIMIM? क्या बंगाल की ज़मीन पर ओवैसी का “सीमांचल मॉडल” पूरी तरह फ्लॉप हो गया?
बिहार में चौंकाने वाले प्रदर्शन के बाद पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बड़ी उम्मीदों के साथ उतरी असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM को इस बार करारा झटका लगा है। मुस्लिम बहुल सीटों पर फोकस और सीमावर्ती जिलों में रणनीतिक एंट्री के बावजूद पार्टी बंगाल में अपना खाता तक नहीं खोल पाई है। शुरुआती रुझानों में AIMIM किसी भी सीट पर बढ़त बनाती नजर नहीं आ रही, जो पार्टी के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है।
चुनाव से पहले AIMIM को उस वक्त बड़ा झटका लगा था, जब हुमायूं कबीर की पार्टी “आम जनता उन्नयन पार्टी” (AJUP) के साथ उसका गठबंधन टूट गया। इसके बाद ओवैसी ने अकेले दम पर चुनाव लड़ने का फैसला किया और 12 सीटों पर उम्मीदवार उतारे। इनमें मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर 24 परगना, बीरभूम, पश्चिम बर्धमान और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिले शामिल थे जहां मुस्लिम आबादी का प्रभाव निर्णायक माना जाता है।
इन सीटों में मोथाबारी, सुजापुर, सूती, रघुनाथगंज, कांडी, नलहाटी, मुरारई, हाबरा, बारासात, बशीरहाट दक्षिण, आसनसोल उत्तरी और करनदिघी प्रमुख थीं। पार्टी को उम्मीद थी कि बिहार के सीमांचल इलाके में मिली सफलता का असर इन सीमावर्ती क्षेत्रों में भी दिखेगा, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग निकली।
चुनाव आयोग के दोपहर दो बजे तक जारी आंकड़ों के मुताबिक, अधिकांश सीटों पर AIMIM उम्मीदवार बेहद कम वोटों पर सिमट गए। मोथाबारी में पार्टी को सिर्फ 995 वोट मिले, सुजापुर में 2500, सूती में 741 और रघुनाथगंज में करीब 1400 वोट ही मिल सके। हालांकि कांडी सीट पर पार्टी ने थोड़ी बेहतर स्थिति दिखाई और 11 हजार से ज्यादा वोट हासिल कर दूसरे स्थान पर बनी हुई है। इसके बावजूद कुल वोट प्रतिशत महज 0.19 फीसदी रहना AIMIM के लिए निराशाजनक प्रदर्शन को दर्शाता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गठबंधन टूटने के बाद AIMIM की चुनावी रणनीति कमजोर पड़ गई। हुमायूं कबीर की AJUP जहां दो सीटों पर बढ़त बनाए हुए है, वहीं उसकी मौजूदगी ने कई सीटों पर वोटों का बंटवारा किया। इससे AIMIM को अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाया और वह मुकाबले से बाहर होती चली गई।
चुनाव के दौरान मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन को लेकर भी विवाद सामने आया। AIMIM ने आरोप लगाया कि बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए गए, जिससे उनके संभावित वोट बैंक पर असर पड़ा। हालांकि चुनाव आयोग ने इन आरोपों पर स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दी है।
ओवैसी पर एक बार फिर एंटी-बीजेपी वोटों को बांटने का आरोप लगा, लेकिन पार्टी ने इसे सिरे से खारिज किया। AIMIM का कहना है कि उनका उद्देश्य केवल अल्पसंख्यकों को एक स्वतंत्र और मजबूत राजनीतिक मंच देना है, ताकि वे अपनी आवाज खुद उठा सकें।
लेकिन इस चुनाव के नतीजों के रुझान यह साफ संकेत दे रहे हैं कि बंगाल में AIMIM की रणनीति फिलहाल सफल नहीं हो पाई है। अधिकांश सीटों पर उम्मीदवारों की जमानत जब्त होने की स्थिति बन गई है, जो पार्टी के लिए एक बड़ा झटका है।
फिलहाल, ये रुझान हैं और अंतिम नतीजे आना बाकी हैं। लेकिन जो तस्वीर उभर रही है, वह AIMIM के लिए एक बड़ा राजनीतिक सबक जरूर साबित हो सकती है कि हर राज्य की राजनीतिक जमीन अलग होती है और वहां अपनी पकड़ बनाने के लिए सिर्फ पुराने फॉर्मूले काफी नहीं होते।