पश्चिम बंगाल की राजनीति में गुरुवार को एक ऐसा घटनाक्रम देखने को मिला जिसने सत्ता और विपक्ष के बीच की सियासी दूरियों पर नए सवाल खड़े कर दिए। विधानसभा के बजट सत्र के पहले ही दिन तृणमूल कांग्रेस के 'कालीघाट गुट' के छह प्रभावशाली नेता सीधे मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के कक्ष में पहुंचे और बंद कमरे में लंबी बातचीत की। चर्चा के केंद्र में पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सुरक्षा में बदलाव, टीएमसी कार्यकर्ताओं पर कथित पुलिसिया कार्रवाई और हाकर्स के खिलाफ चल रही बुलडोजर कार्रवाई जैसे संवेदनशील मुद्दे रहे। यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब बंगाल की राजनीति में लगातार टकराव और आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है।
बंगाल विधानसभा के बजट सत्र का पहला दिन… और सत्ता के गलियारों में एक ऐसी मुलाकात जिसने राजनीतिक हलकों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया। राज्यपाल के अभिभाषण के तुरंत बाद तृणमूल कांग्रेस के 'कालीघाट गुट' के छह वरिष्ठ नेता मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के कक्ष में पहुंचे और उनसे बंद कमरे में अहम बातचीत की।
इस प्रतिनिधिमंडल में कुणाल घोष, शोभनदेव चट्टोपाध्याय, मदन मित्र, अशोक देव, रहीम बक्सी और रुकबानुर रहमान शामिल थे। बैठक का मुख्य मुद्दा पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सुरक्षा व्यवस्था में हालिया बदलाव और राज्यभर में टीएमसी कार्यकर्ताओं पर कथित पुलिसिया कार्रवाई रहा।
दरअसल, इस बैठक की पृष्ठभूमि कुछ दिन पहले तैयार हुई थी, जब बेलेघाटा के पूर्व पार्षद स्वपन समाद्दार की गिरफ्तारी के बाद कुणाल घोष ने मुख्यमंत्री को संदेश भेजकर राजनीतिक प्रतिशोध की भावना से हो रही कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग की थी। तब मुख्यमंत्री ने जवाब दिया था कि ऐसे मुद्दों पर संदेश के जरिए नहीं, बल्कि आमने-सामने बैठकर चर्चा हो सकती है।
इसी बीच बुधवार रात ममता बनर्जी की सुरक्षा में बड़ा बदलाव किया गया। उनके पुराने पांच आरपीएफ अधिकारियों को हटाकर कोलकाता पुलिस के तीन नए सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई। इस बदलाव को लेकर राज्यसभा सांसद डेरेक ओ'ब्रायन ने सोशल मीडिया पर सवाल उठाए और सुरक्षा में लापरवाही का आरोप लगाया।
मुख्यमंत्री के साथ हुई बैठक में टीएमसी नेताओं ने ममता बनर्जी के पुराने और विश्वसनीय सुरक्षा दस्ते की बहाली, जिलों में कार्यकर्ताओं के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने और बिना पुनर्वास नीति के हाकर्स को हटाने की कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग उठाई।
हालांकि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि ममता बनर्जी की जेड प्लस सुरक्षा में कोई कटौती नहीं की गई है। उनके मुताबिक यह केवल सुरक्षा कर्मियों का नियमित प्रशासनिक फेरबदल है। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि देश में प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृहमंत्री के सुरक्षा कर्मी भी स्थायी नहीं होते, इसलिए किसी व्यक्ति विशेष की पसंद के आधार पर सुरक्षा अधिकारियों की नियुक्ति संभव नहीं है।
बैठक के बाद वरिष्ठ विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने कहा कि यह किसी राजनीतिक समझौते की कोशिश नहीं, बल्कि संसदीय परंपराओं के तहत लोकतांत्रिक अधिकारों और जनहित के मुद्दों को सरकार के सामने रखने का एक औपचारिक प्रयास था।
लेकिन इस मुलाकात ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है- क्या बंगाल की राजनीति में टकराव के बीच संवाद की नई शुरुआत हो रही है, या फिर यह सिर्फ संवेदनशील मुद्दों पर अस्थायी राजनीतिक समन्वय का एक प्रयास है? आने वाले दिनों में इसका जवाब बंगाल की सियासत की दिशा तय कर सकता है।
कैमरे पर राजनीतिक तल्खी बरकरार है, लेकिन बंद कमरों में बातचीत का सिलसिला शुरू हो चुका है। अब देखना होगा कि यह संवाद बंगाल की राजनीति में नई नरमी लाता है या फिर सियासी संघर्ष को एक नया मोड़ देता है।