पश्चिम बंगाल की राजनीति में 24 घंटे के भीतर ऐसा सियासी भूचाल आया है, जिसने ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत को ही सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है। जिस विधायक को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया, वही अब दर्जनों विधायकों के समर्थन के साथ सत्ता के गलियारों में नई ताकत बनकर उभरा है। टीएमसी के अंदर बगावत की आग इतनी तेज हो चुकी है कि अब सवाल सिर्फ विधायकों का नहीं, बल्कि सांसदों की वफादारी का भी उठने लगा है। क्या ममता बनर्जी अपनी ही पार्टी पर पकड़ खो रही हैं? क्या बंगाल में शुरू हुई टूट दिल्ली तक पहुंचेगी? और क्या टीएमसी अब अपने सबसे बड़े अस्तित्व संकट का सामना कर रही है? अगले कुछ मिनटों में समझेंगे बंगाल की राजनीति के इस बड़े सियासी उलटफेर की पूरी कहानी।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में बीते 24 घंटे के भीतर ऐसा सियासी घटनाक्रम देखने को मिला है, जिसने ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। जिस बागी विधायक को ममता बनर्जी ने पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया था, वही अब टीएमसी के विधायकों का समर्थन जुटाकर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बन गया है। इस घटनाक्रम ने न केवल राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है, बल्कि अब पार्टी के सांसदों में भी संभावित टूट की अटकलें तेज हो गई हैं।
करीब 15 वर्षों तक पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज रहने वाली ममता बनर्जी हालिया विधानसभा चुनाव में सत्ता से बाहर हो गईं। चुनाव में टीएमसी के 80 विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे थे, लेकिन सत्ता हाथ से जाते ही पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा। एक महीने के भीतर ही पार्टी को ऐसी बगावत का सामना करना पड़ा है, जिसने उसके संगठनात्मक ढांचे और नेतृत्व की पकड़ पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बागी विधायकों ने बढ़ाई ममता की मुश्किलें
टीएमसी से विधायक बने ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी नेतृत्व ने अनुशासनहीनता के आरोप में बाहर का रास्ता दिखाया था। हालांकि यह फैसला उल्टा पड़ता दिखाई दे रहा है। ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया है कि उन्हें टीएमसी के 60 विधायकों का समर्थन प्राप्त है और दो-तिहाई विधायक उनके साथ खड़े हैं।
विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बसु ने बागी खेमे की ओर से सौंपे गए समर्थन पत्रों को स्वीकार कर लिया। इसके बाद विपक्ष के नेता के लिए आवंटित कक्ष की चाबी भी ऋतब्रत बनर्जी को सौंप दी गई। इस कदम ने साफ संकेत दिया कि विधानसभा के भीतर शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है।
ऋतब्रत बनर्जी ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि पार्टी के अधिकांश विधायक वर्तमान नेतृत्व से असंतुष्ट हैं और बदलाव चाहते हैं। उनका दावा है कि टीएमसी अब पहले जैसी एकजुट पार्टी नहीं रही और बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि नए नेतृत्व के पक्ष में हैं।
क्या अब सांसदों की बारी?
विधायकों की बगावत के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या टीएमसी के सांसद भी ममता बनर्जी का साथ छोड़ सकते हैं? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि विधानसभा में शुरू हुई टूट संसद तक पहुंचती है तो इसका असर केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी महसूस किया जाएगा।
लोकसभा और राज्यसभा में टीएमसी का प्रतिनिधित्व ममता बनर्जी की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं का महत्वपूर्ण आधार रहा है। ऐसे में यदि सांसदों का एक वर्ग बागी नेताओं के संपर्क में आता है तो पार्टी की स्थिति और कमजोर हो सकती है।
अभिषेक बनर्जी के खिलाफ असंतोष?
सूत्रों के अनुसार, बागी नेताओं की नाराजगी का एक बड़ा कारण अभिषेक बनर्जी का बढ़ता प्रभाव माना जा रहा है। पार्टी के भीतर कई वरिष्ठ नेताओं और सांसदों को लगता है कि निर्णय प्रक्रिया में उनकी भूमिका लगातार सीमित होती जा रही है।
कई पुराने नेताओं का मानना है कि पार्टी में अब उनकी राय और अनुभव को पहले जैसी अहमियत नहीं मिलती। यही वजह है कि कुछ सांसद नेतृत्व से दूरी बनाते नजर आ रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि बागी गुट इसी असंतोष का लाभ उठाने की कोशिश कर रहा है।
पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर नजर
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बागी गुट का अगला लक्ष्य पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर दावा पेश करना हो सकता है। इसके लिए उन्हें विधायकों और सांसदों दोनों का पर्याप्त समर्थन जुटाने की जरूरत होगी।
दिलचस्प बात यह है कि ऋतब्रत बनर्जी ने ममता बनर्जी को "बागी चीफ एडवाइजर" का पद देने की पेशकश कर राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है। इससे साफ संकेत मिलता है कि बागी खेमे की लड़ाई केवल कुछ पदों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह पार्टी के भविष्य और नेतृत्व की दिशा तय करने की कोशिश कर रहा है।
आगे क्या?
फिलहाल टीएमसी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने विधायकों और सांसदों को एकजुट बनाए रखने की है। यदि पार्टी नेतृत्व जल्द ही असंतुष्ट नेताओं को साधने में सफल नहीं होता, तो यह संकट और गहरा सकता है। बंगाल की राजनीति में शुरू हुई यह हलचल आने वाले दिनों में राष्ट्रीय राजनीति पर भी बड़ा असर डाल सकती है। ममता बनर्जी के लिए यह केवल राजनीतिक चुनौती नहीं, बल्कि अपनी पार्टी पर पकड़ बनाए रखने की सबसे कठिन परीक्षा बनती जा रही है।