राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में एक बार फिर इंदिरा गांधी को याद किया जाना महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि इंदिरा जी कांग्रेस को इन्हीं हालातों से बाहर लेकर आईं थीं जिनमें आजकल राहुल उलझे हुए हैं। इसी तरह उन्हें पार्टी के भीतर और बाहर दोनों ही मोर्चों पर काफी जूझना पड़ा था। इंदिरा गांधी की कहानी राहुल की कहानी को बयां करती है और यूं तो सोनिया गांधी का संघर्ष भी इससे अलग नहीं है। इंदिरा भी शुरूआती दौर में मजबूरी में राजनीति में आईं। पिता की मृत्यू के बाद पार्टी और देश की कमान संभाली। ऐसा ही सोनिया गांधी के साथ हुआ। पिता की हत्या के वक्त महज २१ साल के रहे राहुल को राजनीति में आने में समय था। लिहाजा मां को मोर्चा संभालना पड़ा। राहुल ने 2014 और 2019 में बीजेपी से जो लोहा लिया वो उनको बहुत कुछ सिखा चुका है। राजनैतिक पंडितों का मानना है ऐसे संघर्ष ने राहुल की इमेज को शुरूआती तौर पर कमजोर किया लेकिन उन्हें आने वाले समय के लिए ज्यादा परिपक्व बना दिया है।
भारत जोड़ो यात्रा के जरिए उनका एक परिपक्व चेहरा सामने आ रहा है। अब बुजुर्ग महिला द्वारा खीरा देकर इंदिरा जी का कर्ज उतारने की बात ने राहुल में दादी की छबि लोगों को दिखा दी है। प्रियंका में दादी की छबि देखने की बात हमेशा से होती रही लेकिन कांग्रेस के रणनीतिकार जानते थे कि जो काम राहुल कर सकते हैं वो कोई और नहीं। खुद प्रियंका ने भी हमेशा उन्हें ही आगे रखा। अब वो दौर देखने को मिल रहा है जब अपने परिवार और कांग्रेस के इतिहास को राहुल दोहरा सकते हैं।
इस इतिहास को जानने के लिए इंदिरा गांधी के कुछ महत्वपूर्ण फैसलों को भी एक बार फिर याद करने की जरूरत है जिनकी वजह से एक अपरिपक्व नेता का तमगा लगने के बाद इंदिरा आयरन लेडी के तौर पर उभर कर सामने आईं। जो प्रचार विरोधी दलों ने उनके बारे में किया वही बातें अब राहुल के बारे में कही गईं। कुल मिलाकर कहानी फिर उसी दौर में पहुंच गई।