तिरंगे में लिपटा एक पिता और सामने खड़ा था उसका 11 साल का मासूम बेटा, जिसकी आंखों में आंसू थे, हाथ कांप रहे थे और कंधों पर अचानक आ पड़ी थी जिंदगी की सबसे बड़ी जिम्मेदारी। जम्मू-कश्मीर के डोडा में देश की रक्षा करते हुए शहीद हुए भोजपुर जिले के वीर सपूत हरेराम कुंवर को शनिवार को अंतिम विदाई दी गई। महुली घाट पर पूरे राजकीय सम्मान के साथ हुए अंतिम संस्कार ने हर मौजूद शख्स की आंखें नम कर दीं।
जैसे ही तिरंगे में लिपटा शहीद का पार्थिव शरीर घाट पर पहुंचा, पूरा माहौल गम और गर्व के मिले-जुले एहसास से भर गया। हर तरफ ‘हरेराम कुंवर अमर रहें’ और ‘भारत माता की जय’ के नारे गूंज उठे। लेकिन इन नारों के बीच सबसे भारी थी एक बच्चे की सिसकियां, जो अपने पिता को आखिरी बार देख रहा था।
सबसे भावुक पल तब आया, जब शहीद के 11 वर्षीय बड़े बेटे प्रियांशु ने कांपते हाथों से अपने पिता को मुखाग्नि दी। नन्हे हाथों में अग्नि थी, लेकिन दिल में ऐसा दर्द, जिसे शब्दों में बांध पाना मुश्किल था। पिता के पार्थिव शरीर पर फूल चढ़ाते वक्त प्रियांशु की आंखों से बहते आंसू वहां मौजूद हर इंसान का कलेजा चीर रहे थे। मुखाग्नि के बाद उसने भर्राई आवाज में कहा, “पापा हमेशा कहते थे खूब पढ़ो और एक दिन बड़ा ऑफिसर बनो।” मासूम की ये बातें सुनते ही घाट पर खड़े लोग खुद को रोने से नहीं रोक पाए।
शहीद के पिता ने कांपती आंखों से अपने बेटे को अंतिम प्रणाम किया। छोटे बेटे आदर्श ने अपने पिता को सैल्यूट कर अंतिम विदाई दी। एक परिवार, जिसने अपना सब कुछ देश के नाम कर दिया, उस पल टूटता हुआ नजर आ रहा था, लेकिन उसी टूटन में छिपा था देश के लिए अटूट गर्व।
सेना की टुकड़ी ने बिगुल की गूंज के बीच शहीद को आखिरी सलामी दी। हवा में बार-बार ‘भारत माता की जय’ गूंज रहा था, लेकिन इन नारों के बीच एक सवाल भी तैर रहा था क्या शहीदों की कीमत सिर्फ नारों तक ही सीमित रह गई है?
हजारों की संख्या में लोग शहीद को अंतिम विदाई देने पहुंचे, लेकिन जिले का कोई विधायक या मंत्री मौके पर नहीं पहुंचा। इसे लेकर लोगों में गहरी नाराजगी दिखी। गांववालों और परिजनों का कहना था कि जब एक 11 साल का बच्चा अपने पिता की चिता जला सकता है, तो क्या जनप्रतिनिधि कुछ मिनट निकालकर शहीद को श्रद्धांजलि भी नहीं दे सकते?
यह अंतिम संस्कार सिर्फ एक सैनिक की विदाई नहीं थी, बल्कि यह उस सच्चाई का आईना था, जिसमें शहीद का परिवार आंसुओं में डूबा है और सिस्टम कई बार संवेदनहीन नजर आता है। हरेराम कुंवर देश के लिए शहीद हो गए, लेकिन पीछे छोड़ गए हैं ऐसे सवाल, जिनका जवाब शायद सिर्फ नारों से नहीं मिलेगा।