क्या देश में लोकसभा की तस्वीर बदलने वाली है? क्या 2029 के चुनाव से पहले संसद की सीटें बढ़ सकती हैं? और क्या महिला आरक्षण को जल्दी लागू करने की तैयारी ने सियासी घमासान तेज कर दिया है? इन सवालों के बीच कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखकर बड़ा राजनीतिक दांव चला है। आखिर इस पत्र में क्या मांग की गई है और क्यों परिसीमन का मुद्दा फिर सुर्खियों में है?
देश की राजनीति में एक बार फिर परिसीमन का मुद्दा चर्चा के केंद्र में है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर परिसीमन से जुड़े प्रस्तावित संविधान संशोधन विधेयक पर चर्चा के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है।
खरगे का कहना है कि मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक केंद्र सरकार आगामी मानसून सत्र में परिसीमन से जुड़े संशोधित संविधान संशोधन विधेयक को दोबारा पेश करने की तैयारी कर रही है। ऐसे में संसद में इसे पेश करने से पहले सभी राजनीतिक दलों को मसौदे का अध्ययन करने और अपनी राय रखने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए।
कांग्रेस अध्यक्ष ने अपने पत्र में यह भी याद दिलाया कि इससे पहले मार्च और अप्रैल में उन्होंने संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू को भी पत्र लिखकर सर्वदलीय बैठक बुलाने का अनुरोध किया था। हालांकि, उस समय सरकार ने इस मांग पर कोई पहल नहीं की।
दरअसल, इससे पहले 17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक पेश किया गया था, लेकिन आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिलने के कारण वह पारित नहीं हो सका।
अब माना जा रहा है कि सरकार कुछ बदलावों के साथ इसी विधेयक को फिर से संसद में लाने की तैयारी कर रही है। सरकार का उद्देश्य 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' यानी महिला आरक्षण कानून को जल्द लागू करना है।
मौजूदा कानून के तहत महिला आरक्षण 2027 की जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन के पूरा होने के बाद ही लागू हो सकता है। यानी मौजूदा व्यवस्था में यह 2034 से पहले लागू होना मुश्किल माना जा रहा है।
लेकिन सरकार चाहती है कि महिला आरक्षण का लाभ 2029 के लोकसभा चुनाव से ही महिलाओं को मिल सके। इसके लिए परिसीमन प्रक्रिया में संशोधन करने की योजना पर काम किया जा रहा है।
सूत्रों के मुताबिक सरकार के प्रस्ताव में लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या बढ़ाकर अधिकतम 850 तक किए जाने का विकल्प भी शामिल है। इसका उद्देश्य नई सीटों के साथ महिला आरक्षण लागू करना और राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व का नया संतुलन बनाना है।
हालांकि इस प्रस्ताव को लेकर दक्षिण भारत के कई राज्यों ने अपनी चिंता जताई है। उनका मानना है कि यदि केवल जनसंख्या के आधार पर परिसीमन हुआ तो लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व घट सकता है, जबकि अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को अधिक राजनीतिक लाभ मिलेगा।
इन्हीं आशंकाओं को दूर करने के लिए सरकार सभी राज्यों की सीटों में लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी जैसे विकल्पों पर भी विचार कर रही है, ताकि किसी राज्य का प्रतिनिधित्व कम न हो और राजनीतिक संतुलन बना रहे।
वहीं विपक्ष का कहना है कि इतने महत्वपूर्ण संवैधानिक बदलाव पर जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए। कांग्रेस का आग्रह है कि संसद में विधेयक लाने से पहले सभी दलों के साथ व्यापक चर्चा हो, ताकि राष्ट्रीय सहमति बन सके।
राजनीतिक नजरिए से भी यह विधेयक बेहद अहम माना जा रहा है। पिछली बार सरकार आवश्यक दो-तिहाई बहुमत जुटाने में सफल नहीं हो सकी थी। मौजूदा लोकसभा में एनडीए के पास करीब 300 सांसद हैं, जबकि इस तरह के संविधान संशोधन को पारित कराने के लिए लगभग 360 मतों की जरूरत होगी।
महिला आरक्षण, परिसीमन और लोकसभा सीटों के विस्तार- ये तीनों मुद्दे अब एक-दूसरे से जुड़ चुके हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार विपक्ष को साथ लेकर आगे बढ़ेगी या फिर यह मुद्दा संसद से लेकर सियासी मैदान तक नई बहस और टकराव की वजह बनेगा? आने वाले मानसून सत्र पर अब पूरे देश की नजरें टिकी हैं।