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बुजुर्गों की विरासत को संजो रहे शमी कपूर, आधुनिक युग में भी जिंदा रखी कला

उपमंडल अंब के अंतर्गत पंचायत बेहड़ जसवां के गांव चक्क में आज भी एक ऐसा हाथ है जो लोहे को सिर्फ औजार नहीं, बल्कि विरासत में बदल देता है। यह हाथ है शमी कपूर का, जो अपने बुजुर्गों की सदियों पुरानी परंपरा को न केवल संजोए हुए हैं, बल्कि उसे आत्मनिर्भरता की मिसाल भी बना रहे हैं। आधुनिक युग में जहां मशीनों से बना कृषि उपकरण बाजार में आसानी से उपलब्ध है और नई पीढ़ी पारंपरिक कामों से दूरी बना रही है, वहीं गांव चक्क के शमी कपूर इस विलुप्त होती कला को जीवित रखे हुए हैं। आज लोहार का काम लगभग बंद होने की कगार पर है, लेकिन शमी कपूर ने इसे अपने जीवन का आधार बना लिया है। शमी कपूर के दादा स्वर्गीय लक्ष्मण दास पारंपरिक लोहार थे। उनके निधन के बाद यह जिम्मेदारी उनके पिता सुखदेव दत्त ने संभाली, लेकिन रोजगार की मजबूरी के चलते वे दिल्ली नौकरी करने चले गए। इसके बाद शमी कपूर जो स्वयं आईटीआई इलेक्ट्रिशियन की पढ़ाई कर चुके थे और एक निजी कंपनी में कार्यरत थे, ने बड़ा फैसला लिया। उन्होंने नौकरी छोड़कर गांव लौटने और अपने दादा की विरासत को आगे बढ़ाने का फैसला लिया। शमी ने प्रधानमंत्री आत्मनिर्भर प्रशिक्षण केंद्र से प्रशिक्षण प्राप्त किया और सरकार की ओर से 15,000 रुपये की टूल किट सहायता मिलने के बाद दोबारा कार्य शुरू किया। आज वे अपने हाथों से हर प्रकार का कृषि औजार, हल, फावड़ा, दराटी, कुदाल सहित अन्य उपकरण तैयार करते हैं। इसका सबसे बड़ा लाभ ग्रामीण किसानों को मिल रहा है। किसानों को अब कृषि उपकरणों के लिए बाहर नहीं जाना पड़ता, उन्हें घर-द्वार पर ही सुविधा मिल रही है। इससे समय और पैसे दोनों की बचत हो रही है।

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