श्रावण अष्टमी मेले के दौरान मां चिंतपूर्णी के दरबार में सुगम दर्शन पास व्यवस्था को लेकर एक बुजुर्ग श्रद्धालु ने सवाल उठाए हैं। लुधियाना के प्रेम नगर निवासी और एसबीआई से सेवानिवृत्त 77 वर्षीय के.के. गुगलानी ने सरकार से सुगम दर्शन व्यवस्था बंद करने की मांग की है। उनका कहना है कि मंदिर में पैसे देकर दर्शन की व्यवस्था किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। के.के. गुगलानी के अनुसार वह स्वयं बाबा माईदास सदन में सुगम दर्शन पास बनवाने के लिए पहुंचे थे। पास के लिए उन्हें करीब तीन घंटे तक कतार में खड़ा रहना पड़ा। जब उनकी बारी आई तो उनके पास एसबीआई का पहचान पत्र था, जिसमें उनका पूरा पता और जन्मतिथि दर्ज थी। इसके बावजूद आधार कार्ड अनिवार्य होने की बात कहकर उनका पास बनाने से मना कर दिया गया। आधार कार्ड उपलब्ध नहीं होने के कारण उन्हें बिना सुगम दर्शन पास बनवाए ही वापस लौटना पड़ा। उन्होंने कहा कि यदि पैसे देकर दर्शन के लिए पास लेने के बावजूद बुजुर्ग श्रद्धालुओं को घंटों लाइन में खड़ा रहना पड़े और फिर दस्तावेज के कारण वापस लौटना पड़े, तो इसे सुगम दर्शन कहना उचित नहीं है। गुगलानी ने कहा कि चिंतपूर्णी में बड़ी संख्या में बुजुर्ग और बीमार श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। ऐसे श्रद्धालुओं के लिए लंबी कतार में खड़ा होना पहले ही मुश्किल होता है। इसके बावजूद पास बनवाने के लिए भी घंटों इंतजार करना पड़े तो उनकी परेशानी और बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि मंदिर में आने वाले श्रद्धालु आस्था के साथ दर्शन करने पहुंचते हैं। ऐसे में दर्शन की सुविधा को आर्थिक आधार पर अलग-अलग करने की व्यवस्था पर सरकार को पुनर्विचार करना चाहिए। के.के. गुगलानी ने पंजाब और हिमाचल की व्यवस्थाओं की तुलना करते हुए कहा कि पंजाब सरकार बुजुर्गों को तीर्थ स्थलों की यात्रा के लिए निशुल्क यात्रा सुविधा उपलब्ध करवा रही है, जबकि हिमाचल में मंदिरों में दर्शन के लिए श्रद्धालुओं से शुल्क लिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार और मंदिर प्रशासन को बुजुर्गों तथा जरूरतमंद श्रद्धालुओं की सुविधा को प्राथमिकता देनी चाहिए। उनका कहना है कि धार्मिक स्थलों पर श्रद्धा के साथ आने वाले सभी श्रद्धालुओं को समान रूप से दर्शन की सुविधा मिलनी चाहिए। गुगलानी ने सरकार और मंदिर प्रशासन से सुगम दर्शन पास व्यवस्था को बंद करने की मांग की। उन्होंने कहा कि मां चिंतपूर्णी के दरबार में दर्शन के लिए श्रद्धालुओं के बीच पैसे के आधार पर किसी तरह का अंतर नहीं होना चाहिए। उन्होंने प्रशासन से ऐसी व्यवस्था बनाने का आग्रह किया, जिसमें बुजुर्ग, बीमार और जरूरतमंद श्रद्धालुओं को बिना अतिरिक्त आर्थिक बोझ के सम्मानजनक और सुविधाजनक तरीके से दर्शन हो सकें।