घिरी-घिरी आई बदरिया रे... हो बदरिया रे... एक तरफ राजधानी में रात से बरस रहे बदरा ने मौसम सुहाना किया, वहीं दूसरी तरफ कमानी ऑडिटोरियम में गायिका ने सावन की कजरी से लोगों को भिगोना शुरु कर दिया। कहते हैं मतवाले सावन में विरहिणी का दिल कांपता ही नहीं, झूमता भी है। जैसे सावन में प्रकृति शीतलता की चादर ओढ़ लेती है, वैसे ही पिया मिलन और प्रेम वियोग में स्त्री का मन भी व्याकुल हो उठता है। पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने जैसे ही मधुर शुरुआत की दर्शक अपनी सीटों पर बैठे कजरी की मस्ती में झूमने लगे। इस कजरी में केवल सावन ही नहीं था, इसमें था सावन में पिया से वियोग, मिलन, भादों के प्रेम और खाली बरसात।