पिछले तीन साल से उत्तराखंड में मानसून हर बार एक नई तबाही और पहेली लेकर आ रहा है। जाहिर है कि मौसम के बदलते मिजाज को भांपकर खुद को भी बदलने की जरूरत है।
बदलाव अप्रत्याशित है
पिछले तीन साल से मौसम के मिजाज में आ रहा बदलाव इतना अप्रत्याशित है कि लोग हतप्रभ हैं। बादल इस कदर टूटकर बरसते हैं कि सड़कों से लेकर पक्के मकानों तक की नींव खिसक जाती है। 2010-11 में सितंबर में इतना पानी बरसा था कि प्रदेश में करीब 14 हजार किमी. सड़क और 1000 किमी. संपर्क मार्ग क्षतिग्रस्त हो गए।
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2011-12 में उत्तरकाशी और रुद्रप्रयाग में बादल फटने की घटनाओं से खासा नुकसान हुआ। इन्हीं गुजरे तीन सालों में प्रदेश में अति संवेदनशील गांवों की संख्या एक सौ से बढ़कर 450 से अधिक हो चुकी है।
यात्रा पर आने की अपील करनी पड़ी
मई से अक्टूबर तक चलने वाली चार धाम यात्रा का असर गढ़वाल मंडल के साथ ही मसूरी, नैनीताल सहित अन्य पर्यटन केंद्रों पर भी दिखाई देता है। अनुमान है कि इस अवधि में एक करोड़ से अधिक यात्री प्रदेश की ओर रुख कर चुके होते हैं। सड़कों के टूटने और यात्रियों के फंसने सूचनाएं इस सीजन में आम हो रही हैं। यही वजह है कि सरकार को यात्रियों से मानसून बीतने के बाद ही यात्रा पर आने की अपील करनी पड़ी।
मौसम के इस बदलाव को सरकार और नियोजन को भी समझना होगा। सरकार ने 2012 में एक एक्शन प्लान बनाया था। इसमें माना गया कि अचानक और भारी बारिश की घटनाओं में तेजी से इजाफा होगा। लेकिन इससे निपटने की कोई कोशिश नहीं हुई। मौसम पर निगाह रखने का कोई तंत्र विकसित नहीं किया गया।
उच्च हिमालयी क्षेत्र में मौसम क्यों कहर बरपा रहा है, इसका जवाब भी नहीं तलाशा गया। सालों से अपनी हथेली की तरह मौसम को पढ़ते आए लोगों के अनुमान भी ध्वस्त हो रहे हैं। जिन लोगों का जीवन नदियों के किनारे एक शताब्दी कटा, वही नदियां उनके लिए अब काल का पर्याय बन रही हैं।
नीति घाटी में होती थी रिमझिम
चमोली जिले की घाटी नीति में तेज बारिश नहीं होती थी। मलारी गांव के आनंद के मुताबिक बरसात ऐसी होती थी कि पूरा भिगोने के बाद भी कहीं कोई बूंद तक भी नहीं दिखाई देती थी। अब तो बिजली कड़कती है और मूसलाधार पानी गिरता है। घाटी में भी बादल फट रहे हैं। लोगों के मुताबिक यह बदलाव अब भारी पड़ रहा है।
अनियोजित विकास
केदार और बदरीनाथ घाटी में तबाही की एक वजह अनियोजित विकास भी है। नदी तट से 200 मीटर तक निर्माण पर रोक की सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन का ही पालन कर लिया गया होता तो जन और धन हानि को बहुत कम किया जा सकता था।
क्या हैं संस्तुतियां
-मौसम के अप्रत्याशित बदलाव पर जुटाएं वैज्ञानिक जानकारी
-विकास योजनाओं, कृषि, आपदा प्रबंधन में मौसम बदलाव के प्रभावों का समावेश
-आपदा प्रबंधन में नुकसान कम करने की रणनीति और कार्ययोजना का विकास
-सीएस की अध्यक्षता में बनी 29 सदस्यीय स्टेट क्लाइमेट चेंज कमेटी दे सुझाव
-बदलाव से आम लोगों, अफसरों और अन्य संबंधित पक्षों को करें जागरूक
क्या पड़ रहा है फर्क
-प्राकृतिक आपदाओं की संख्या में तेजी से इजाफा
-पर्यटन या फिर कृषि आधारित आर्थिक गतिविधियां प्रभावित
- देश के लिए वाटर हाउस होने के नाते अन्य क्षेत्र भी प्रभावित
-क्षेत्रीय असंतुलन, आपदा से पर्वतीय जिले तेजी से पिछड़ रहे हैं
-स्थानीय लोगों की समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं
प्रदेश में पुनर्वास की बाट जोह रहे गांवों की संख्या 450
-चारधाम यात्रा मार्ग के सैकड़ों गांवों के सामने रोजीरोटी का संकट
केदारनाथ में तबाही के पीछे राज
अभी यह पूरी तरह से साफ नहीं हो पाया है कि केदारनाथ में 16-17 जून को होने वाली तबाही के पीछे सटीक वजह क्या थी। पर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान और इसरो की रिपोर्ट इसे मौसम बदलाव के साथ भी जोड़ रही है। रिपोर्ट के मुताबिक केदारनाथ में भारी बरसात से पहले जमकर बर्फबारी भी हुई। दूरसंवेदी संचार संस्थान की एक रिपोर्ट के मुताबिक उच्च हिमालयी क्षेत्र में इस आपदा से पहले खासी बर्फ पड़ी थी। 15 से लेकर 16 जून तक भारी बरसात हुई। इन तीन दिनों में राज्य में सामान्य से करीब 400 प्रतिशत अधिक पानी बरसा।
ऐसे में बरसात के कारण ताजी बर्फ भी पिघली और इस कारण मंदाकिनी सहित अन्य हिमालयी नदियों में पानी तेजी से बढ़ा। 1999 के भूकंप के कारण यह क्षेत्र से पहले से ही जर्जर है। ऐसे में इस बरसात के कारण जगह-जगह भूस्खलन हुआ। संस्थान की रिपोर्ट के मुताबिक केदारनाथ से लेकर सोनप्रयाग के बीच में ही करीब 192 नए भूस्खलन के क्षेत्र बने हैं।
इनका क्या कहना है
माउंटेन टास्क फोर्स की ओर से 2006 में जारी की गई रिपोर्ट में यह साफ कह दिया गया था कि ग्लेशियर और पर्वतीय क्षेत्रों को समझने के लिए समग्र अध्ययन जरूरी है। पूरी कोशिश के बावजूद हम हिमालय से संबंधित जानकारी के मामले मे किसी अंधकार युग में रह रहे दिख रहे हैं।
पर्वतीय क्षेत्रों के अध्ययन के लिए करीब 19 संस्थान है पर इनमें समन्वय की कमी है। टास्क फोर्स की साफ संस्तुति थी कि विभिन्न स्तर पर हो रहे शोध कार्य को एक सूत्र में पिरोया जाए जिससे सही तस्वीर सामने आ सके।
- डा. आरएस टोलिया, पूर्व मुख्य सचिव उत्तराखंड और टास्क फोर्स के चेयरमैन
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