उत्तराखंड आपदा में सब कुछ गंवा चुके लोगों को अपनी पहचान के साक्ष्य खुद जुटाने होंगे। इससे उनके ऊपर दोहरा संकट खड़ा होने जा रहा है। राहत के लिए बने मानक पीड़ितों के सामने कुछ व्यावहारिक परेशानी खड़ी कर रहे हैं।
खासकर वह लोग जिनका सब कुछ बह चुका है और बताने दिखाने को उनके पास कोई कागजात नहीं है। लापता सदस्य को मृतक मानते हुए पांच लाख की राहत राशि पाने को एफिडेविट देने के साथ साबित करना होगा कि वह आपदा वाले दिन 16 और 17 जून को क्षेत्र में मौजूद था।
आपदा पीड़ितों को सरकारी इमदाद पाने को अधिकारियों के सामने अपनी पहचान बताने को गवाह लाने पड़ रहे हैं। कितना नुकसान हुआ और क्या बहा इसका ब्यौरा आस-पड़ोस वालों की गवाही से तय हो रहा है।
राशि के वितरण में फर्जीवाडे़ से डरे अधिकारी पहचान की पुष्टि करने को हर तरीका अपना रहे हैं। उन्हें डर है कि गड़बड़ी की शिकायतें आईं तो जांच झेलना भारी पड़ेगा। अधिकारियों का यह भय पीड़ितों पर भारी पड़ रहा है।
'पहचान की कोई दिक्कत नहीं आनी चाहिए। जिस तरह से जाति और निवास प्रमाण पत्र के संबंध में पटवारी गांव के लोगों से बातचीत कर सूचना जुटाता है, उसी तरह इसमें भी किया जा सकता है। जरूरी नहीं कि हर सूचना कागजी साक्ष्य से ही एकत्र हो।'
- एसएस रावत, सचिव कार्मिक एवं सामान्य प्रशासन