इस प्रदेश का आपदा प्रबंध तंत्र खुद ही आपदाग्रस्त है। तीन बड़ी आपदाओं के बाद भी राज्य आपदा प्राधिकरण को सक्रिय नहीं किया गया। आलम यह है कि 17 जून को केदारनाथ की तबाही का संकेत मिलने के बाद भी इसी दिन हुई कैबिनेट की बैठक में इसका जिक्र तक नहीं था।
अब परते खुल रही हैं तो जाहिर हो रहा है कि अगर तंत्र पूरी तरह सक्रिय होता तो कई लोगों को काल का ग्रास बनने से बचाया जा सकता था।
17 जून की तबाही के बाद देहरादून के आपदा प्रबंधन और कंट्रोल रूम के पास सूचना कोई भी पुख्ता सूचना नहीं थी। रुद्रप्रयाग जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी के सामने भी तस्वीर साफ नहीं थी। यही हाल चमोली का रहा। इसका नतीजा यह रहा कि सरकार ही नहीं किसी अफसर को भी केदारघाटी में कुदरत के कहर की कोई सूचना नहीं थी।
कैग में सवाल उठाए गए थे
दरअसल, राज्य के आपदा प्रबंधन तंत्र पर 2010 की रिपोर्ट में कैग में सवाल उठाए गए थे। अगर रिपोर्ट में बताई गईं खामियों पर गौर किया गया होता तो शायद प्रदेश सरकार केदारनाथ की आपदा से निपटने को कुछ बहुत हद तक तैयार भी होती। लेकिन रिपोर्ट पर किसी ने ध्यान नहीं दिया और आपदा प्रबंधन महज राहत देने तक ही सीमित होकर रह गया।
2010-11 की बारिश ने प्रदेश का सड़कों का नेटवर्क पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया था। राज्य गठन के बाद यह यह प्रकृति की सबसे बड़ी चेतावनी थी। लेकिन आपदा प्रबंधन तंत्र के सर्वोच्च शिखर में न के बराबर हलचल रही। मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण बना तो है।
लेकिन इसकी कोई बैठक नहीं बुलाई गई। उस समय भी सरकार का सारा जोर क्षतिग्रस्त सड़कों के लिए केंद्र से पैकेज हासिल करने पर ही रहा।
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2012 में उत्तरकाशी और रुद्रप्रयाग जिले में जमकर तबाही हुई। अस्सी ने पूरे उत्तरकाशी को हिला कर रख दिया था। रुद्रप्रयाग में उखीमठ के पास बादल फटने से खासा नुकसान हुआ। यमुना घाटी भी हनुमान गंगा के कारण थर्रा गई थी। लेकिन इस बार भी पुराना ढर्रा अपनाया गया।
राहत बांटने के नाम पर हो हल्ला हुआ और बाढ़ नियंत्रण कार्य को लेकर सियासत हुई। राज्य आपदा प्राधिकरण फिर भी सक्रिय नहीं हुआ।
मुख्यमंत्री या फिर आपदा प्रबंधन मंत्री और न ही प्राधिकरण के चार अन्य सदस्य मंत्रियों को इस बात की फिक्र महसूस हुई कि मिल बैठकर देखा जाए कि क्या किया जा सकता है। इस बार की तबाही के बाद भी सरकार और मंत्रियों के सुर अलग है। आपदा प्रबंधन मंत्रालय यशपाल आर्य के पास है।
पेयजल, स्वास्थ्य, खाद्य, परिवहन आदि मंत्री भी प्राधिकरण के सदस्य हैं। पर पूरी आपदा के दौरान शायद ही अन्य मंत्रियों की सक्रियता खुल कर सामने आई हो।
कैग की रिपोर्ट के अहम बिंदु
-आपदा प्रबंधन के प्रति सरकार का अगंभीर रुख साफ दिखाई देता है। 2007 में राज्य आपदा प्राधिकरण का गठन होने के बाद 2008 में महज एक बैठक हुई। सरकार विकास कार्य में आपदा को रोकने वाले कारकों को शामिल करने में विफल रही। (अगर कैग की नसीहत पर अमल किया गया होता तो केदारघाटी में जान और माल के नुकसान का खासा कम किया जा सकता था।)
-राज्य आपदा प्रबंधन सलाहकार समिति का गठन 2008 में किया गया पर इसकी सिर्फएक बैठक हुई। (तीन बड़ी आपदाओं के बाद अभी तक इस समिति ने कोई सुझाव नहीं दिया।)
-ट्रामा सेंटर स्थापित न होने के कारण आपदा से प्रभावित लोगों को त्वरित उपचार नहीं दिया जा सका।
-विश्वसनीय संचार व्यवस्था के अभाव में सूचनाओं के आदान प्रदान में 24 घंटे तक की देरी हुई।
-पुनर्वास और विस्थापन नीति के अभाव में 80 आपदाग्रसित गांवों का पुनर्वास नहीं हो पाया।(अब इन संवेदनशील गांवों की संख्या बढ़कर 350 से अधिक हो चुकी है। अब पुनर्वास का मसला पुनर्निर्माण और पुनर्वास प्राधिकरण को सौंपा गया है।)
-राज्य आपदा प्रबंधन अधिनियम के मुताबिक आपदा प्रबंधन एवं न्यूनीकरण से संबंधित सभी विभागों को कार्ययोजना तैयार करनी थी, विकास के कार्य में आपदा न्यूनीकरण के पक्ष को शामिल करना था। लेकिन कुछ नहीं किया गया। किसी विभाग ने इस मामले में बजट भी जारी नहीं किया। विभाग पूरी तरह से आपदा मोचन निधि (सीएआरएफ) पर निर्भर रहे। सीएआरफ के पूरे पैसे का भी उपयोग नहीं किया गया।
-स्टेट इमरजेंसी रिस्पांस सेंटर और जिला स्तर पर गठित इमरजेंसी रिस्पांस सेंटर में पर्याप्त कार्मिक नहीं थे।
-आपदा से नुकसान के आंकलन की जिम्मेदारी सरकार की है। नुकसान का आकलन किसी भी विभाग ने नही किया। (केदारनाथ और बदरीनाथ घाटियों में तबाही के 22 दिन बाद भी नुकसान का प्रारंभिक आंकड़ा तक सरकार के पास नहीं है)
कागजों तक ही रहीं योजनाएं
सबसे बड़ा सबक यही है कि मात्र कागजों पर योजनाएं बनाने से काम नहीं चलेगा। आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत यूं तो जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन योजना बनाई गई थी। इसमें संवेदनशील क्षेत्र भी चिंह्नित किए गए थे। पर यह सब लगता है कागजों तक ही सीमित रहा। आपदा प्रबंधन और न्यूनीकरण योजनाएं यूं तो गांव के स्तर पर भी तैयार की जा रही हैं पर इनका उपयोग नहीं हो पा रहा है।
पहला सबक ही भूल गए
विशेषज्ञों के मुताबिक आपदा के समय पहली प्रतिक्रिया प्रभावित लोगों की ओर से होती है। ऐसे में स्थानीय लोगों को आपदा से निपटने के लिए तैयार करने पर सबसे अधिक जोर होना चाहिए। डीएमएमसी की ओर से इसके लिए बकायदा मास्टर ट्रेनर भी तैयार किए जा रहे हैं। न्याय पंचायत स्तर पर इस तरह की पांच हजार लोगों को तैयार करने का दावा भी किया जा रहा है। पर इन लोगों को सर्च और रेस्क्यू के लिए कितना तैयार किया गया यह केदारघाटी में हुई तबाही के बाद सामने आया।
इनका प्रशिक्षण भूकंप के आने को ध्यान मे रखकर दिया गया। ऐसे में अलग-थलग पड़े गांवों के ये स्वयं सेवी खुद ही आपदा में उलझ कर रह गए। चार धाम यात्रा पर आने वाले लोगों को संभावित खतरों के प्रति आगाह करने और फंस जाने पर बच निकलने के रास्तों की जानकारी देने की भी कोई कोशिश नही की गईं।
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