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उत्तराखंड तबाहीः खौफजदा लोगों की 7 दर्दभरी दास्तान

Fri, 21 Jun 2013 08:50 AM IST
देहरादून/नई दिल्ली/ब्यूरो
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उत्तराखंड में आसमान से बरसी आफत ने कई परिवारों की खुशियां छीन ली। जो लोग भगवान के दर्शन करने वहां गए थे, इनमें कुछ लोग ही सकुशल लौट पाए।
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इन लोगों ने जब आपबीती बताई तो हर किसी के आंख से आंसू छलक उठे। हर कोई यह सोचने पर मजबूर हो गया कि आखिर कुदरत ने किसी दूसरे के अपराध का बदला इन लोगों से क्यों लिया?

परिजनों से बात करने को तड़प गए
हरियाणा के जिला कैथल, फरल गांव निवासी जयपाल सिंह ने बताया कि गंगोत्री से लौटते हुए रास्ते में भूस्खलन से मार्ग बंद हो गया। भूखे प्यासे चार दिन बस में गुजारे।
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तस्वीरों में: तबाही के बाद राहत का इंतजार

संचार सेवाएं ठप होने से परिजनों से बात करने को तड़प गए। प्रशासन से कोई मदद नहीं मिली, दून पहुंचे तो लगा नया जीवन मिल गया। गांव के 22 लोग गए थे, लेकिन 12 ही दून पहुंच पाएं हैं। बाकी अब भी बीच रास्ते में फंसे हैं।

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रामरती बताती हैं कि प्रकृति ने जो कहर बरपाया उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। नीचे उफनती नदी, ऊपर से पत्थर-बोल्डर गिरने का डर, न जाने किस पल मौत सामने आ जाए।

कलेजे के टुकड़े ने गोद में तोड़ा दम
जीवन संगिनी, आठ वर्षीय बेटी और चार वर्षीय बेटा आंखों के सामने मलबे में जिंदा दफन हो गए। मुंह के अंदर पानी और मलबा घुसने से बेसुध 12 वर्षीय बेटे को दो दिन तक मुंह से ऑक्सीजन देता रहा।

सवाल पूछ रही जिंदगियां, तबाही का जिम्मेदार कौन?

मगर, वह भी साथ छोड़ गया। यह दुखद दास्तां है वरोला, अलीगढ़ (यूपी) के हरिओम वर्मा की, जो परिवार के साथ केदारनाथ बाबा के दर्शन के लिए गए थे। जलप्रलय ने उनके हंसते खेलते परिवार को छिन लिया। यह गम वर्मा को जिंदगी भर सालता रहेगा।

तस्वीरों में: आसमान से बरसी आफत

केदारनाथ में आए बाढ़ के सैलाब ने उनकी पत्नी रश्मि देवी और तीन बच्चों को छिन लिया। बकौल वर्मा 12 वर्षीय बेटे ने गोद में ही दम तोड़ा। हालात ऐसे थे कि उसके शव को भी साथ नहीं ला पाया...और बिलखने लगे।

किसी तरह जान बच गई
सुजान सिंह, थराली के रघुवीर, सुनील, दर्शन, रघुवीर सिंह और मकर सिंह ने बताया कि वे गौरीकुंड से केदारनाथ पैदल रूट पर घोड़े-खच्चरों का संचालन करते थे।

कितने लोग मरे? जितने मुंह, उतनी बातें

वे अपने घोड़े-खच्चरों को तो नहीं बचा पाए, लेकिन खुद किसी तरह बच गए। गौरीकुंड में मौत के चंगुल से छूटे तो जान बचाने के लिए पैदल ही आगे बढ़े।

16 जून की रात से चलना शुरू किया तो घाट प्रखंड के 30 बेरोजगार युवा बृहस्पतिवार को भूखे-प्यासे दुग्गलभिट्टा होते हुए 165 किमी की पैदल दूरी नापते हुए गोपेश्वर पहुंचे। उनकी आंखों में गौरीकुंड में तबाही का मंजर साफ झलक रहा था।

...और मौत से साक्षात्कार हो गया
भगवान के दर्शन कराने गए थे लेकिन रास्ते में मौत से साक्षात्कार हो गया। सोनप्रयाग में अचानक आई बाढ़ ने सबकुछ तबाह कर दिया। यह आपबीती उन वाहन चालकों की है, जो तीर्थयात्रियों को लेकर चारधाम पर गए थे।

कुदरती कहर के बाद दिखे इंसानी फितरत के कई रुप

देखते ही देखते सड़क धंसने लगी और वहां खड़ी गाड़ियां एक-एक कर नदी में खिलौने की भांति बहने लगी और हम अपनी जान बचाने के लिए सबकुछ छोड़कर ऊंचाई की ओर भागे। इनमें से चार वाहन चालक किसी तरह मौत को मात देकर ऋषिकेश पहुंचे।

बादल देख कांप जाती है रूह
गौरीकुंड (केदारनाथ) में आई आपदाओं को पार करते हुए खच्चर व्यवसायी नवीन सिंह दानू पुत्र लाल सिंह दानू निवासी कर्मी, नवीन सिंह पुत्र प्रवीण सिंह निवासी बघर, प्रताप सिंह पुत्र धन सिंह निवासी कर्मी लौट पाए हैं।

आपदा में अपना पूरा रोजगार गंवा चुके नवीन कहते हैं कि जिंदगी बच गई अब फिर कमा लेंगे रुपये। गौरीकुंड में उफनाती अलकनंदा और क्षतिग्रस्त रास्तों से जोखिम उठाते हुए पैदल कपकोट पहुंचे नवीन ने बताया कि अब भी बादलों को देखकर वे कांप जाते हैं।

उन्होंने कहा कि कपकोट के करीब सात खच्चर व्यवसायी वहां अब भी फंसे हुए हैं। शायद ही बिछडे़ साथियों से अब उनकी मुलाकात हो पाएगी। अलंकनदा नदी पार करते उन्होंने 30 से अधिक व्यवसायियों को नदी में बहते देखा।

'मौत के मुंह से लौटा हूं'
केदारनाथ में बारिश और भूस्खलन से हुई तबाही से बिहार के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे सुरक्षित लौट आए, मगर उनके साथ गए दो लोगों की मौत हो गई।

पांच लोग लापता हैं। स्वास्थ्य मंत्री परिजनों सहित 15 सदस्यीय दल के साथ केदारनाथ धाम के दर्शन करने के लिए गए थे।

जिंदा बचे लोगों की आपबीती

मौत के मुंह से लौटे चौबे ने कहा कि 16 जून की रात से ही केदारनाथ में मौत का तांडव शुरू हो गया था। रात के अंधेरे में कई लोग मलबे के साथ बह गए। जो लोग जिंदा बचे, उन्होंने मंदिर में आसरा लिया।

रात लाशों के ढेर और कड़ाके की ठंड में गुजारनी पड़ी। दूसरे दिन किसी तरह जान बचाकर वह परिवार के साथ गौरीकुंड पहुंचे। इसके बाद उन्हें फाटा लाया गया और हेलीकाप्टर से जौलीग्रांट पहुंचाया गया।

जलजला सा आया...बस अड्डा नदी में समा गया
सकुशल देहरादून पहुंचे जगाधरी के नानकचंद गुप्ता, कुसुमलता गुप्ता, देहरादून की सरला गोयल और सहारनपुर की उर्मिल अग्रवाल ने बताया कि 15 जून की शाम को जब तेज बारिश का अंदेशा हुआ तो हम केदारनाथ दर्शन कर नीचे की ओर वापस चल दिए।

बारिश के बीच ही रामबाड़ा फिर हम गौरीकुंड पहुंच गए। 16 जून को सोनप्रयाग होते हुए सीतापुर आए। शाम को अचानक होटल के सामने का नजारा खतरनाक बन गया। बस और कारों से भरा बस अड्डा कुछ ही पलों में नदी में समा गया।
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यह नजारा देखने के बाद वे रुके नहीं और रात में ही रामपुर की ओर चल पड़े। यहां एक गेस्ट हाउस में रुके लेकिन पानी इस कदर था कि रातभर जागकर काटी। सुबह को रामपुर से फाटा पहुंचे।
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