बाबा केदार के धाम में जब जलप्रलय से हाहाकार मचा था और लोग अपनी जान बचाने के लिए किसी सुरक्षित स्थान की तलाश में इधर-उधर भाग रहे थे, तब लोगों को केदारनाथ के रक्षक भुकुंड ने अपने यहां शरण दी। यहां जो भी गया, वह सुरक्षित रहा।
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प्रलय की पूरी रात खुले आसमान के नीचे मूसलाधार बारिश में बैठे रहे। आज केदारपुरी तबाह हो चुकी है, पर भैरव मंदिर और इसमें रखी मूर्तियां बिल्कुल सुरक्षित हैं। भुकुंड भैरव को केदारनाथ का क्षेत्रपाल यानि रक्षक कहा जाता है।
केदारनाथ में 16 जून की शाम को मंदिर के पीछे से बड़ी मात्रा में तेजी से पानी के साथ मलबा आया। दूसरे दिन 17 जून सुबह तीर्थयात्री और स्थानीय लोग कुछ संभल पाते उससे पहले ही मलबे ने लोगों को अपने आगोश में ले लिया। चारों ओर अफरा-तफरी मची थी।
कुछ लोग केदारनाथ मंदिर के गर्भगृह और सभा मंडप में गए। हालांकि पानी की मात्रा और मलबा इतना अधिक था कि यहां भी कई लोग सुरक्षित नहीं रह पाए, जो लोग सुरक्षित स्थानों में नहीं पहुंच पाए, वे भैरव मंदिर की ओर दौड़े। केदारनाथ से एक किमी की दूरी पर स्थित यह स्थान कुछ ऊंचाई पर होने से सुरक्षित था, जिससे यहां जो भी लोग जान बचाने के लिए गए सुरक्षित रहे।
पानी बढ़ते ही इस ओर भागने लगे
स्थानीय लोग भुकुंड भैरव के स्थान को जानते थे, इसलिए वे पानी बढ़ते ही इस ओर भागने लगे। ऊखीमठ निवासी प्रदीप सेमवाल ने बताया कि जब केदारपुरी में बचने की संभावना धूमिल हो गई थी, पानी मंदिर के कलश तक उछाल मार रहा था, तब भैरव ही एक मात्र उम्मीद की किरण नजर आए। मेरे साथ दो-ढाई सौ लोग भी भैरव मंदिर की ओर भागे, लेकिन कई तो बाढ़ की चपेट में आ गए थे। डेढ़ सौ से ज्यादा लोग मंदिर में पहुंच गए।
गुप्तकाशी निवासी आनंद तिवारी बताते हैं कि उन्हें तो भैरव मंदिर में मानो दूसरा जीवन मिला है। उन्होंने बताया कि यहां डेढ़-दो सौ से अधिक लोगों ने दो दिन खुले आसमान की नीचे बिताई और सुरक्षित रहे।
बाबा के पहले रावल थे भुकुंड भैरव
वैसे भुकुंड भैरव को भगवान केदारनाथ का क्षेत्रपाल कहा जाता है। इसका अर्थ रक्षक से है। जब शीतकाल में केदारनाथ मंदिर के कपाट बंद हो जाते हैं, तो ऐसी मान्यता है कि उसके बाद संपूर्ण केदार क्षेत्र की रक्षा भुकुंड भैरव ही करते हैं। भुकुंड जंगम लिंग केदारनाथ के सबसे पहले रावल थे।
उनसे ही केदारनाथ मंदिर में रावल परंपरा की शुरूआत हुई और बाद में उनके नाम पर भुकुंड भैरव मंदिर बनाया गया।