शासन की ओर से आबकारी नीति एफएल - टू में बदलाव किए जाने के बाद उत्तराखंड कृषि उत्पादन एवं विपणन बोर्ड यानी मंडी परिषद को करारा वित्तीय झटका लगा है। उल्लेखनीय है कि एफएल टू नीति लागू होने और शराब कारोबार का जिम्मा मंडी परिषद के पास होने की वजह से परिषद को मोटी कमायी होती थी।
आंकड़ों पर नजर डाले तो शराब कारोबार से होने वाली आय में से 50 फीसदी मुनाफा मंडी परिषद के खाते में जाता था जबकि बाकी 25 -25 फीसदी कमायी गढ़वाल मंडल विकास निगम और कुमाऊं मंडल विकास निगम को होती थी। राज्य सरकार की ओर से आबकारी नीति एफएल टू लागू किए जाने के प्रदेश में शराब कारोबार का जिम्मा मंडी परिषद के पास था।
मंडी परिषद के जरिए पूरे प्रदेश में बेची जाती थी शराब
मंडी परिषद के जरिए पूरे प्रदेश में शराब बेची जाती थी। परिषद की ओर से गढ़ृ़वाल और कुमाऊं में दो बड़े स्टोर खोले गए थे। इन स्टोरों से दोनों मंडलों के सभी 13 जिलों में शराब की आपूर्ति की जाती थी।
मंडी परिषद ने शराब के कारोबार के लिए ठीकठाक तंत्र भी विकसित कर लिया था जिसमें विभागीय अफसरों, कर्मचारियों की तैनाती के साथ ही गढ़वाल मंडल विकास निगम (जीएमवीएन) और कुमाऊं मंडल विकास निगम (केएमवीएन) से बड़े बड़े गोदाम किराए पर लिए गए थे।
कांग्रेस सरकार की ओर से शराब कारोबार का जिम्मा मंडी परिषद को सौंपे जाने के बाद इससे होने वाले लाभ से परिषद ने विकास की तमाम योजनाएं तैयार की थी जिन्हें अब किसी भी सूरत में मूर्तरूप नही दिया जा सकेगा।
सरकार ने शराब कारोबार की जिम्मेदारी बेशक मंडी परिषद को थी लेकिन इससे कारोबारियों को कई परेशानियां भी थी। जिसे कारोबारी खुलकर बोल नहीं पाते थे।