देहरादून में सक्रिय बावरिया और भातू गैंग की तरह सपेरा भी एक जनजाति है। इस जनजाति का मुख्य पेशा चोरी, डकैती और हत्या करना है। यह जनजाति घोर अंधविश्वासी होती है और जहां घटना को अंजाम देती है वहां पर गैंग का एक सदस्य शौच करता है।
शौच कर अपने देवता को करते हैं खुश
शौच कर यह अपने देवता को खुश करने की कोशिश करते है और उससे अगली घटना के लिए आशिर्वाद मांगते हैं। यह खतरनाक इस कदर होते हैं कि कोई सामने आ जाए तो फिर उसकी नृशंसता से हत्या कर देते हैं।
पंजाब के अमृतसर जिले के पास तरण तारण कस्बे में मुरादपुरा रेलवे स्टेशन है। इसी रेलवे स्टेशन के पास है सपेरा जनजाति की बस्तियां। इसी बस्ती से कुछ परिवार टूट कर दून के नेहरू कालोनी और राजपुर के सपेरा कस्बे में बस गए हैं।
मुख्य धारा में शामिल
हालांकि दून में बसे सपेरा जनजाति के लोग अब जुर्म की दुनिया से विस्थापित होकर समाज की मुख्य धारा में शामिल हो गए हैं। लेकिन तरण तारण के सपेरे अभी भी उतरी भारत की पुलिस के लिए सिरदर्द बने हुए हैं।
अगस्त की शुरूआत में तरण तारण से सपेरों के सरदार ने गैंग को चार हिस्सों में बांट दिया है। एक समूह ने दून में आमद की है। एक हल्द्वानी गया हैं। जबकि एक हिमाचल और चौथा पंजाब में ही घटनाओं को अंजाम दे रहा है।
आपस में बात नहीं करते
इस गैंग की ‘मोड ऑफ अप्रैंटिस’ बावरिया और भातू गिरोह से अलग है। घर से निकलने के बाद गिरोह का कोई भी सदस्य आपस में बात नहीं करता। यह केवल इशारों में बात करते हैं और हां या ना का जवाब साथ लाए डंडे को जमीन पर पटक कर देते हैं।
इस जनजाति में विवाह तब ही होता है जब युवक अपनी होने वाली पत्नी के सामने यह प्रूफ करे कि उसने कई संगीन अपराधों को अंजाम दिया है। एसपी सिटी डा. जगदीश चंद्र बताते हैं इस गैंग की एक पहचान और होती है। एक बार पकड़े जाने के बाद यह कभी अपनी पहचान नहीं खोलते।