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Uttarakhand: नैनीताल-ऊधमसिंहनगर लोकसभा सीट के कई मुद्दे, आजादी के बाद से बरकरार; इन चुनौतियों से परेशान जनता

Wed, 20 Mar 2024 05:01 PM IST
हीरा मेहरा चंदन बंगारी, संवाद

सार

नैनीताल-ऊधमसिंह नगर लोकसभा सीट में आज भी ऐसे कई मुद्दे हैं जो आजादी के बाद से उठ रहे हैं। किसानों को एमएसपी, मानव-वन्यजीव संघर्ष और आपदा से जूझने के अलावा पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी समस्याएं आज भी यहां के लोगों के लिए आम हैं।
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पलायन - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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केसी पंत, एनडी तिवारी जैसे दिग्गजों की सियासी रणभूमि रही नैनीताल-ऊधमसिंह नगर लोकसभा सीट में आज भी एेसे कई मुद्दे हैं जो आजादी के बाद से उठ रहे हैं। किसानों को एमएसपी, मानव-वन्यजीव संघर्ष और आपदा से जूझने के अलावा पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और रेल सुविधाओं का विस्तार जैसी समस्याएं आज भी यहां के लोगों के लिए आम हैं।

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स्थानीय लोगों का भी कहना है कि यूपी के जमाने से हर चुनावों में समस्याओं से लेकर समाधान तक की बात होती है लेकिन चुनाव के बाद धीरे-धीरे इनकी चर्चा भी बंद हो जाती है। इससे तो यही साबित होता है कि सियासी पार्टियों के लिए ये सिर्फ चुनावी मुद्दे हैं। इन्हें हल करना उनकी प्राथमिकताओं में नहीं है। इस चुनाव में भी भाजपा, कांग्रेस और दूसरे दलों के प्रत्याशियों के प्रचार में ये मुद्दे फिर जोर-शोर से उठेंगे।

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14 विधानसभा सीट आती हैं इस लोकसभा क्षेत्र में
आजादी के बाद 1951 में हुए पहले चुनाव में कांग्रेस से सीडी पांडे सांसद निर्वाचित हुए थे। तब इस सीट पर नैनीताल, ऊधमसिंहनगर के साथ ही बरेली का बहेड़ी और रानीखेत क्षेत्र भी होता था। राज्य गठन के बाद नए परिसीमन के बाद इस सीट में ऊधमसिंहनगर की नौ और नैनीताल की रामनगर छोड़कर पांच विधानसभाएं आती हैं। नैनीताल के पहाड़ी क्षेत्र से लेकर भाबर और तराई का क्षेत्र मानव-वन्यजीव संघर्ष से प्रभावित हैं। यहां तेंदुए, हाथी, बाघ, जंगली सुअर, भालू के हमलों में हर साल 12 से अधिक लोग अपनी जान गंवाते हैं। जंगली जानवरों के साथ ही लावारिश पशु किसानों की फसलों को चौपट कर देते हैं। बीते कुछ वर्षों में कुदरती आफत भी किसानों के लिए परेशानी का सबब बन हुई है। 

1-मानव-वन्यजीव संघर्ष बन गई अब बड़ी समस्या
आजादी के बाद 1951 में हुए पहले   चुनाव में कांग्रेस से सीडी पांडे सांसद निर्वाचित हुए थे। तब इस सीट पर नैनीताल, ऊधमसिंहनगर के साथ ही बरेली का बहेड़ी और रानीखेत क्षेत्र भी होता था। राज्य गठन के बाद नए परिसीमन के बाद इस सीट में ऊधमसिंहनगर की नौ और नैनीताल की रामनगर छोड़कर पांच विधानसभाएं आती हैं। नैनीताल के पहाड़ी क्षेत्र से लेकर भाबर और तराई का क्षेत्र मानव-वन्यजीव संघर्ष से प्रभावित हैं। यहां तेंदुए, हाथी, बाघ, जंगली सुअर, भालू के हमलों में हर साल 12 से अधिक लोग अपनी जान गंवाते हैं। जंगली जानवरों के साथ ही लावारिश पशु किसानों की फसलों को चौपट कर देते हैं। बीते कुछ वर्षों में कुदरती आफत भी किसानों के लिए परेशानी का सबब बन हुई है। 

2- दशकों पुराने रेलवे स्टेशन से आगे नहीं बढ़ पाई रेल लाइन
आजादी के बाद 1951 में हुए पहले   चुनाव में कांग्रेस से सीडी पांडे सांसद निर्वाचित हुए थे। तब इस सीट पर नैनीताल, ऊधमसिंहनगर के साथ ही बरेली का बहेड़ी और रानीखेत क्षेत्र भी होता था। राज्य गठन के बाद नए परिसीमन के बाद इस सीट में ऊधमसिंहनगर की नौ और नैनीताल की रामनगर छोड़कर पांच विधानसभाएं आती हैं। नैनीताल के पहाड़ी क्षेत्र से लेकर भाबर और तराई का क्षेत्र मानव-वन्यजीव संघर्ष से प्रभावित हैं। यहां तेंदुए, हाथी, बाघ, जंगली सुअर, भालू के हमलों में हर साल 12 से अधिक लोग अपनी जान गंवाते हैं। जंगली जानवरों के साथ ही लावारिश पशु किसानों की फसलों को चौपट कर देते हैं। बीते कुछ वर्षों में कुदरती आफत भी किसानों के लिए परेशानी का सबब बन हुई है। 

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3-पहाड़ से ही नहीं मैदान से भी हुआ
पलायन आयोग के आंकड़ों की मानें तो लोकसभा सीट में सुविधा संपन्न माने जाने वाले ऊधमसिंहनगर से पांच सालों में 28531 लोग स्थायी रूप से पलायन कर चुके हैं जबकि 307310 लोग अस्थायी रूप से रोजगार के लिए पलायन कर चुके हैं। अस्थायी पलायन से प्रभावित ग्राम पंचायतों की संख्या 6436 है जबकि स्थायी पलायन से प्रभावित ग्राम पंचायतों की संख्या 2067 है। इनमें औद्योगिक शहर कहे जाने वाले रुद्रपुर और काशीपुर भी शामिल हैं। दस सालों में नैनीताल जिले में अस्थायी पलायन करने वालों की संख्या 20710 और स्थायी पलायन करने वालों की संख्या 4803 है।

4-फसल का समय पर नहीं होता किसानोें को भुगतान
ऊधमसिंहनगर को धान का कटोरा कहा जाता है लेकिन किसानों को धान, गेहूं और गन्ने की फसल का समय से भुगतान नहीं होना बड़ी समस्या रहा है। इसे लेकर किसान हाईकोर्ट में याचिका तक दाखिल कर चुके हैं, बावजूद इसके समस्या हल नहीं हुई। धान और गेहूं में एमएसपी की गारंटी का मुद्दा भी लंबे समय से लंबित है। बाजपुर के 20 गांवों का मुद्दा भी इस बार चुनाव में सुर्खियां बनेगा।
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मरीजों को डोली का सहारा
भीमताल विधानसभा क्षेत्र के ओखलकांडा ब्लॉक में आज भी कई ऐसे गांव हैं जहां से मरीजों को इलाज के लिए अस्पताल पहुंचाने से पहले आठ से दस किलोमीटर या फिर इससे अधिक दूरी तक डोली अथवा घोड़ों में लाना होता है। यही नहीं गांवों में इलाज की सुविधा न होने के कारण इसके बाद भी उन्हें सौ से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर हल्द्वानी या फिर नैनीताल ले जाना होता है।

गहराता पेयजल संकट
बीते दो तीन दशकों में लगातार बढ़ते कंक्रीट के जंगलों ने जनपद के पर्वतीय जिले के प्राकृतिक स्रोतों को लील लिया है। रही सही कसर बाहर से आए उन लोगों ने पूरी कर दी है जिन्होंने अपने होटल और रिजाॅर्ट में ट्यूबवेल खोद दिए, जिसकी वजह से दूरस्थ गांवों में भी अब गर्मियों में लोगों को पानी के लिए परेशान होना पड़ता है।

ये भी हैं कुछ खास मुद्दे
लोकसभा सीट में राष्ट्रीय लॉ विश्वविद्यालय का मुद्दा भी प्रभावी होगा। छह साल पहले उत्तराखंड के लिए मंजूर हुए लॉ विश्वविद्यालय के लिए किच्छा में 26 एकड़ जमीन उच्च शिक्षा विभाग को मिल गई थी, लेकिन सियासी होड़ में इसे डोईवाला ले जाकर शिलान्यास भी कर दिया गया, मामला कोर्ट में लंबित है। वहीं, बदहाल सरकारी स्कूल, हल्द्वानी शहर में आईएसबीटी, चौतरफा जाम का भी मुद्दा है।
 
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