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खाली होते गांवों की बेबसी: बेटे नौकरी की तलाश में छोड़ गए घर-बार, पलायन रुके कैसे, जब पहाड़ पर नहीं रोजगार

Fri, 10 Nov 2023 02:36 PM IST
हीरा मेहरा अमर उजाला नेटवर्क, नैनीताल

सार

बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और सबसे जरूरी रोजगार की आस जब पहाड़ पर पूरी नहीं होती है तब युवा अपने बुजुर्ग माता-पिता की दहलीज छोड़ने के लिए विवश होते हैं।अंत में परेशान होकर रोजगार की आस में पलायन को ही बेहतर विकल्प समझते हैं...
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पलायन - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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रिवर्स पलायन की बात हर मंच पर होती है, लेकिन बुनियादी सुविधाओं और स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराए बगैर यह संभव नहीं है। पहाड़ के ग्रामीण तो ऐसा ही मानते हैं कि जब तक उन्हें घर पर रोजगार, शिक्षा, चिकित्सा सुविधाएं नहीं मिलेंगी तब तक उन्हें वहां रोक पाना चुनौती ही है। रही बात रिवर्स पलायन की तो इस पर सिर्फ बातें ही हुईं हैं, काम कम ही हुआ है। कोरोनाकाल में जो लोग शहरों से लौट आए थे, वह वक्त था कि उन्हें यहां स्टार्टअप के लिए धन मुहैया कराकर रोका जाता, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। कोरोना संकट कम हुआ तो फिर रोजगार की चाह में लोगों को घरबार छोड़ना पड़ा। 
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वीडियो देखें-  

https://www.amarujala.com/video/uttarakhand/nainital/video-khal-hata-gava-ka-bbsa-kahana-javana-kara-gaii-palyanabugdhhapa-thakha-raha-ghara-oura-aagana

रिवर्स पलायन की जो उम्मीद जगी थी वह फिर धूमिल पड़ गई। पलायन की सबसे अधिक मार पर्वतीय जिलों के दूरदराज के गांवों पर पड़ी। क्योंकि छोटी सी बीमारी के इलाज के लिए उन्हें शहरों की दौड़ लगानी पड़ रही है। शिक्षा के लिए भी उन्हें शहरों का ही रुख करना पड़ रहा है। रोजगार तो ऐसी समस्या है कि उसके लिए घर छोड़ना जैसा पहाड़ के युवाओं की नियति बन गई है। 
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जो लोग खेतीबाड़ी कर आजीविका कमा रहे हैं, जंगली जानवर फसल नष्ट कर उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दे रहे हैं। ऐसे में उनके पास गांव घर को छोड़ शहरों में बस जाना एकमात्र विकल्प है। कुमाऊं के पर्वतीय जिलों पर पलायन की मार ऐसी पड़ी है कि यहां के पांच जिलों में 269 गांव जनशून्य हो चुके हैं। 
 

कुमाऊं के पर्वतीय जिलों में जनशून्य हो चुके गांव
जिला          गांव
अल्मोड़ा       95
बागेश्वर       73
पिथौरागढ़    52
चंपावत        27    
नैनीताल      22
कुल            269 

उत्तराखंड ग्राम विकास एवं पलायन निवारण आयोग की रिपोर्ट-
2023 के अनुसार 2008 से 2018 तक प्रदेश में 6338 ग्राम पंचायतों में कुल 383726 लोगों ने अस्थायी तौर पर पलायन किया था, जबकि 3946 ग्राम पंचायतों से 118981 लोगों ने स्थायी पलायन किया।

 

चंपावत
  • जिला अर्थ एवं संख्याधिकारी दीप्तकीर्ति तिवारी के मुताबिक चंपावत जिले के 675 गांवों में से 27 गांव जनशून्य। उत्तराखंड बनने से पहले 23 गांव आबादीहीन थे।
  • 11 गांवों की आबादी दस से भी कम है। इन गांवों में ज्यादातर उम्रदराज लोग हैं।- तीन विकासखंडों के 39 गांवों में मुख्यमंत्री पलायन रोकथाम योजना के तहत 224.26 लाख रुपये से कार्य गतिमान।

चंपावत जिले के ये गांव हैं जनशून्य 
ढुंगाजोशी मल्ला, पटआंगड़, जाख, बगजीवाला, सुरकोट, रूदेली, जडिय़ाकंद, मौन, सिमलक, बुंगामारा, खाटखुटम, बनतड़ी, चमौला, बेस्टानौला, स्यूर, बलरूनीमहर, तल्लानयाबाद, चौरी, चंचलपुर, ध्यानभंडारी, क्वैराला, गिरी पुनेठी, खर्रागूंठ, कालीदुर्गा बगौटी, सालगूंठ, सम्यूगूंठ और कमस्यून।

नैनीताल
  • जिले के 22 गांव जनशून्य हो गए हैं। जिले में स्थायी तौर पर 4823 और 20,951 लोगों ने अस्थायी तौर पर पलायन किया है।

गांवों से सबसे अधिक पलायन  सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में हुआ है। -डॉ.पीतांबर अवस्थी, समाजशास्त्री जंगली जानवरों ने खेती चौपट की तो रोजगार के साधन खत्म हो गए। रोजगार की तलाश में गांव छोड़ शहरों का रुख किया तो नगर में घर बनाकर बसना पड़ा। - नंद किशोर कांडपाल, दरमान, हवालबाग।  

 

ऊधमसिंह नगर
  • स्थायी पलायन का सबसे कम प्रभाव यूएस नगर जिले में हुआ है। 
  • अस्थायी पलायन में जिला आठवें स्थान पर है। 
  • पलायन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक जिले की 191 ग्राम पंचायतों में 19,583 - व्यक्तियों ने साढ़े चार साल में अस्थायी पलायन किया है।
  • सबसे अधिक खटीमा की 49 ग्राम पंचायतों में 5192 व्यक्तियों व सबसे कम - जसपुर की 18 ग्राम पंचायतों में 419 व्यक्तियों ने अस्थायी रूप से पलायन किया है। 
  • दो ग्राम पंचायतों में 82 व्यक्तियों ने 4.5 सालों में स्थायी पलायन किया है। 
  • सबसे अधिक ब्लॉक रुद्रपुर की एक ग्राम पंचायत के 70 व्यक्तियों व सबसे कम काशीपुर की एक ग्राम पंचायत में 12 व्यक्तियों ने स्थायी रूप से पलायन किया है।

पलायन की मुख्य बजह मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। गांव में पेयजल की दिक्कत थी। जंगली जानवरों के आतंक से खेती छोड़नी पड़ी। अब भी मूलभूत सुविधाओं का विस्तार और जंगली जानवरों से मुक्ति मिले तो फिर से वीरान गांव आबाद हो सकते हैं। - कैलाश मेहरा, नैनोली, हवालबाग। 

 

अल्मोड़ा 
  • अल्मोड़ा में राज्य गठन से अब तक पलायन से 95 गांव जनशून्य हो गए हैं। 
  • हवालबाग ब्लॉक में सबसे अधिक 15 गांव जनशून्य हुए हैं। भिकियासैंण  में 14, लमगड़ा में 13, द्वाराहाट, ताकुला में 10-10 गांव जनशून्य। इन गांवों में कभी आबाद खेत अब पूरी तरह बंजर हो चुके हैं।
  • 525 गांव ऐसे हैं जहां की आबादी 250 से कम है। इन गांवों से 23 सालों में 30 से 40 प्रतिशत पलायन हुआ है। पलायन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार अल्मोड़ा में 19205 लोग बीते एक दशक में पलायन कर चुके हैं। 
  • गोविंद बल्लभ पंत के गांव खूंट में बीते दो दशक में 80, महेंद्र सिंह धौनी के गांव ल्वाली में 40 परिवारों ने पलायन किया है। 

पिथौरागढ़
  • पलायन के कारण जनशून्य हो चुके हैं पिथौरागढ़ के 52 गांव।
  • जिले के 41 गांवों में 50 फीसदी से अधिक आबादी पलायन कर चुकी है
  • राज्य गठन के समय जिले में 1600 गांव आबाद थे। अब जिले में आबाद गांवों और तोकों की संख्या 1548 रह गई है। 
  • जिले के 973 गांवों के 40670 लोग स्थायी या अस्थायी रूप से पलायन कर चुके हैं। 
  • धारचूला का खिमलिंग और मुनस्यारी का मिलम गांव तीन दशक पहले ही जनशून्य हो चुके थे। 
  • बेड़ीनाग और गंगोलीहाट के गांवों से भी पलायन हुआ है। गंगोलीहाट तहसील में सबसे अधिक 14 गांव खाली हो चुके हैं। 
  • बेड़ीनाग और मूनाकोट में 13 गांव, धारचूला, मुनस्यारी में चार गांव, कनालीछीना में तीन गांव और विण ब्लॉक में दो गांव खाली हो चुके हैं। अधिकांश गांव ऐसे हैं जिनमें अब केवल  गिने चुने परिवार ही रह गए हैं।

 

बागेश्वर 
  • जिले में 73 गांव जनशून्य हो गए हैं। इनमें कई तो राज्य गठन से पहले ही आबादी विहीन हो गए थे।
  • जिला विकास अधिकारी कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार 19 ग्राम पंचायतों के 34 राजस्व गांवों में 50 प्रतिशत से अधिक पलायन हुआ है। 

इन गांवों से पलायन
भतौड़ा, ठांगा रौतेला, भड़ात, ऐरारी, फयालडोब, बसकूना, तोली, फरसाली पल्ली, छारसिंग, पांकड़, बटालगांव, मल्ला पन्याली (बड़ी पन्याली), अखट, चोखट (चोरखट), ओखलधार, जैंसर, ढुकरा, हुनेरा, नरग्वाड़ी, तल्ला डोबा, मल्ला डोबा, लौबांज, भोजगढ़, नौधर स्टेट, डुमलोट, अयारतोली, मोनियाभ्योल, बैगांवकालरो, रियूनीलखमार, पैय्या तल्ला, पैय्या मल्ला, वज्यूला, नौगांव अठरो, कोट्यूड़ा।
 
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पलायन रोकथाम के लिए योजनाएं प्रस्तावित
मुख्यमंत्री पलायन रोकथाम योजना के तहत पलायन वाले गांवों के लिए पांच करोड़ पंद्रह लाख रुपये की योजनाएं प्रस्तावित हैं। ग्राम्य विकास विभाग ने टैंक, तारबाड़, फार्म मशीनिरी, पुलिया, सड़क, आजीविका संवर्धन की 28 योजनाएं प्रस्तावित की हैं। उद्यान विभाग ने 258 पॉलीहाउस, मत्स्य विभाग ने 32 मत्स्य तालाब और टैंक, पशुधन कार्य की 131 योजनाएं, युवा कल्याण विभाग ने एक खेल मैदान, उरेडा ने 17 स्ट्रीट लाइट, बाल विभाग ने 6 आंगनबाड़ी भवन, शिक्षा विभाग ने शौचालय निर्माण, भवन मरम्मत, स्नार्ट क्लास की 16 योजनाओं का चयन किया है। 

जिले के पलायन वाले गांवों के लिए मुख्यमंत्री पलायन रोकथाम योजना संचालित की गई है। 34 गांवों के विकास के लिए 489 योजनाएं प्रस्तावित की गई हैं। इन गांवों में कई कार्य पहले किए जा चुके हैं। - अनुराधा पाल डीएम बागेश्वर 
 
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