महाभारत कालीन महादेव मंदिर का शिवलिंग 12वां उप ज्योतिर्लिंग है। शिवलिंग की मोटाई अधिक होने के कारण यह मोटेश्वर महादेव मंदिर के नाम से विख्यात है। स्कंद पुराण में भगवान शिव ने कहा कि जो भक्त कांवड़ कंधे पर रखकर हरिद्वार से गंगा जल लाकर यहां चढ़ाएगा, उसे मोक्ष मिलेगा। इसी मान्यता के चलते मन्नत पूरी होने पर यहा लोग कांवड़ चढ़ाते हैं।
चैती मैदान में महादेव नगर के किनारे मोटेश्वर महादेव मंदिर स्थित है। यहां रोजाना सैकड़ों श्रद्धालु पूजा करने आते हैं। हर साल महाशिवरात्रि पर्व पर यहां भव्य मेला लगता है। यूपी के जिला मुरादाबाद, रामपुर, बिजनौर, ठाकुरद्वारा से कई श्रद्धालु यहां हर साल कांवड़ चढ़ाने आते हैं। शिवरात्रि में एक दिन पहले से मंदिर में भक्तों की लाइन लग जाती है और आधी रात से कांवड़ चढ़नी शुरू हो जाती है। मोटेश्वर महादेव मंदिर दूसरी मंजिल पर है। शिवलिंग के चारों ओर तांबे का फर्श बना है। यह मंदिर जागेश्वर के कारीगर ने बनाया है। मोटाई अधिक होने के कारण शिवलिंग किसी व्यक्ति की कोलिया में नहीं आता।
यह शिवलिंग स्थापित नहीं बल्कि जमीन से टिका है। कई लोगों ने इसकी गहराई नापने की कोशिश की लेकिन नहीं नाप सके। लोगों का अनुमान है कि शिवलिंग की गहराई लगभग 30 फुट है। 1942-43 में मंदिर के भूतल में भगदड़ मचने से तीन-चार लोगों की मौत हो गई थी। तब से भूतल बंद कर दिया गया। अब ऊपरी मंजिल पर मंदिर है। पुजारी राघवेंद्र नागर ने बताया यह मंदिर महाभारत कालीन हैं। मान्यता है कि गुरु द्रोणाचार्य गोविषाण में कौरव-पांडवों को शिक्षा दे रहे थे, तभी द्रोणाचार्य को शिवलिंग दिखाई दिया। तब भीम ने वहां पर मंदिर बनाकर द्रोणाचार्य को गुरुदक्षिणा में दिया। एक समय में इस मंदिर के चारों ओर 120 शिव मंदिर थे। गुजराती ब्राह्मण नागर परिवार नौ पीढ़ियों से मंदिर की सेवा कर रहे हैं। नागर ने बताया कि बुक्शा जनजाति के लोगों का महादेव कुल देवता हैं। पहले मंदिर का फर्श पीतल का था। एक श्रद्धालु ने इसे गलाकर उसका घंटा बनाया। उसके स्थान पर जयपुर से बैलगाड़ियों से मार्बल का पत्थर मंगाकर लगाया है। शायद यह पहला मंदिर है जिसकी दीवारें अंदर से कई कोणों में है। श्रद्धालुओं ने कई बार मंदिर का जीर्णोद्धार किया। 1980 में सेठ मूलप्रकाश की मन्नत पूरी होने पर उन्होंने संपूर्ण मंदिर का जीर्णोद्धार कराया।