पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश से भारत में घुसपैठ हो रही है। पूर्वी पाकिस्तान के विस्थापित बंगाली बाहुल्य क्षेत्र उत्तराखंड के तराई, यूपी के पीलीभीत और बरेली जनपद क्षेत्रों में बांग्लादेशी मय परिवार के निवास करने लगे हैं। जो भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद यहां विस्थापित किए गए परिवारों के बीच रहकर घुल-मिल गए हैं। यहां तक कि कई परिवारों ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर राशन कार्ड, पहचान पत्र आदि प्रमाण पत्र भी बनवा लिए हैं। खुफिया तंत्र इसको लेकर अलर्ट हो गया है और बांग्लादेशियों की पहचान के लिए गहनता से जांच में जुटा है। भारत में घुसपैठ के लिए दोनों देशों के बीच की खुली सीमा मुफीद मानी जा रही है।
भारत-पाकिस्तान बंटवारे को लेकर 16 अगस्त 1946 को बंगाल में दंगा-फसाद और मार काट होने पर पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) से लाखों हिंदू बंगाली भारत आए थे। 1951-52 में पश्चिम बंगाल के रानाघाट ट्रांजिट कैंप के शरणार्थियों को भारत सरकार ने उत्तराखंड के ऊधमसिंह नगर (तत्कालीन उत्तर प्रदेश के नैनीताल) जिले के दिनेशपुर में मौरूसी काश्तकार के रूप में डेढ़ एकड़ से लेकर आठ एकड़ तक वर्ग आठ (नॉन जैड-ए) के भूमि पट्टे देकर बसाया था। यहां 1954 तक करीब 36 गांव बंगाली बाहुल्य बन चुके थे। इसी तरह 1957-58 में मध्य प्रदेश के रायपुर जिले के माना कैंप सहित कई अन्य शिविरों के शरणार्थियों को शक्तिफार्म के दस गांवों में जमीन देकर बसाया गया।
इसके बाद 1971 में बांग्लादेश के कुछ परिवारों को जेलकैंप में जमीन दी गई और फिर धीरे-धीरे गदरपुर, नानकमत्ता, मेलाघाट, पूरनपुर व भोजीपुरा आदि क्षेत्रों में ये परिवार निवास करने लगे। सूत्रों की मानें तो करीब एक साल से बांग्लादेश की खुली सीमा से घुसपैठ कर सैकड़ों परिवार यहां आकर इन क्षेत्रों में बसे विस्थापित परिवारों के बीच रहने लगे हैं।
बताया जा रहा है कि इन बांग्लादेशी परिवारों में से कई लोगों ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर अपने राशन कार्ड, पहचान पत्र, आधार कार्ड आदि प्रमाण पत्र भी बनवा लिए हैं। दो माह पहले जब खुफिया विभाग को इसकी जानकारी हुई तो शक्तिफार्म क्षेत्र में रहने वाले कई संदिग्ध परिवारों का डाटा कलेक्ट कर उनकी जांच शुरू की गई।