काशीपुर। आपातकाल के दौरान काशीपुर के मोहल्ला सिंघान निवासी लोकतंत्र सेनानी महेश चंद्र अग्रवाल 127 दिन बिना मुकदमे के जेल में बंद रहे। उन्हें पुलिस ने यातनाएं भी दीं। उनका कहना है कि वह काला दिन कभी नहीं भूल सकते।
देश के इतिहास में 25-26 जून 1975 की वह रात कभी भुलाई नहीं जा सकती जब राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद ने देश में आपातकाल की घोषणा की थी। अगले दिन 26 जून को देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रेडियो पर कहा कि राष्ट्रपति ने देश में आपातकाल की घोषणा कर दी है।
मोहल्ला सिंघान निवासी महेश चंद्र अग्रवाल (77) पुत्र स्व. किशोर लाल अग्रवाल ने बताया कि आपातकाल के दौरान पुलिस ने लाठी-डंडों से देशद्रोही गतिविधियों में शामिल होने की बात स्वीकार न करने पर उन्हें यातनाएं दीं। लगभग 127 दिन उन्हें जेल में बिना किसी मुकदमे के बंद रखा गया। उन्होंने बताया कि वह काला दिन कभी भूल नहीं सकते।
वह मूल रूप से रामनगर के रहने वाले हैं। वर्ष 1971 में वह काशीपुर व्यापार करने आए थे और किराए पर मकान-दुकान लेकर कारोबार शुरू किया था। 25 जून 1975 की रात देश में राष्ट्रपति ने आपातकाल घोषित कर दिया। लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई में काशीपुर के लोगों का भी बड़ा योगदान रहा। तत्कालीन इंदिरा सरकार के फैसले के विरोध में यहां छोटे नीम में हुए प्रदर्शन में उनके अलावा सुशील कुमार व कृष्ण कुमार अग्रवाल ने अग्रणी भूमिका निभाई थी। 17 जुलाई को तत्कालीन कोतवाल राय बहादुर ने उन्हें दुकान से गिरफ्तार कर लिया। रामलाल खुराना, लक्ष्मी नारायण एडवोकेट, हरिशंकर अग्रवाल व सुशील अग्रवाल भी गिरफ्तार किए गए। सभी के हाथ-पैरों में बेड़िया डालकर नैनीताल जेल में बंद कर दिया गया। अग्रवाल बताते हैं उनके जैसे कई लोग कई-कई हफ्ते बिना खाए जेलों में लड़ाई लड़ते रहे। इस दौरान जेल में ही देश विरोधी साजिश रचने जैसे गंभीर आरोप स्वीकार करने का दबाव बनाया गया। ऐसा नहीं करने पर उन लोगों को तीन दिन यातनाएं दीं।
काशीपुर के थे 19 लोकतंत्र सेनानी
काशीपुर। आपातकाल के दौरान नैनीताल जिला और वर्तमान में ऊधमसिंह नगर जिले के लगभग 90 बंदियों में से 19 काशीपुर के लोकतंत्र सेनानी थे। वर्तमान में अब महेश चंद्र अग्रवाल, सुशील कुमार व कृष्ण कुमार अग्रवाल ही जीवित हैं। आपातकाल के खिलाफ जेल में बंद रहे क्षेत्र के 16 लोगों का स्वर्गवास हो चुका है। महेश चंद्र अग्रवाल बताते हैं उस वक्त काशीपुर समेत आसपास क्षेत्र के कुल 472 लोग बंद हुए थे जिसमें से अब मात्र 48 लोग ही जीवित बचे हैं।
एक टीस अब भी है मन में
लोकतंत्र सेनानियों के दिल में एक टीस अब भी है। बताया कि जब सरकार ने चार साल पहले पेंशन देना शुरू की तब 68 लोग जीवित थे। अब उनमें से भी 20 लोगों का निधन हो चुका है। इसके बावजूद गजट आज तक पास नहीं हुआ। लोकतंत्र सेनानियों को आज तक प्रमाणपत्र व परिचयपत्र तक नहीं मिला। बताया कि उन लोगों के राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े होने के बावजूद राज्य की सरकारों ने कोई तवज्जो नहीं दी। यूपी समेत कई राज्यों में लोकतंत्र कानून बना दिया है लेकिन उत्तराखंड में लोकतंत्र सेनानियों के लिए कुछ नहीं किया। वहीं सरकारी स्तर पर कभी भी लोकतंत्र सेनानियों को सम्मानित नहीं किया गया।