उत्तराखंड आपदा में बहुत कुछ तबाह हो गया है। जिन इलाकों में कभी पर्यटकों की भीड़ होती थी आज वह वीरान और खामोश हैं। ना पर्यटक इन इलाकों में हैं और ना पहले जैसी बात ही यहां नजर आती है।
प्रकृति से बरती नेमतों ने पर्यटक स्थल की पहचान दिलाकर सैकड़ों स्थानीय लोगों को रोजगार मुहैया कराया लेकिन बीते दो सालों में प्रकृति के कहर ने ही इसे उजाड़ कर रख दिया। अब यहां के लोग पलायन के लिए मजबूर हैं।
यह कहानी है एक दशक में फर्श से अर्श और अब फिर फर्श पर आए यमुनोत्री राजमार्ग पर यमुना किनारे बसे खरादी कस्बे की। एक दशक पीछे जाएं तो खरादी में एक अदद प्राकृतिक झरना और आसपास ग्रामीणों के खेत भर थे।
यमुनोत्री धाम आने वाले देशी-विदेशी पर्यटक यहां रुक कर प्राकृतिक सौंदर्य का लुत्फ उठाने लगे तो यहां पर्यटन रोजगार का बड़ा जरिया बनने लगा। शुरू में छोटी दुकानों और ढाबे खुले और देखते ही देखते यहां सौ से ज्यादा होटल, व्यापारिक प्रतिष्ठान और कालोनियां अस्तित्व में आ गई।
धारमंडल क्षेत्र के स्यालब, सुकण, कुर्सिल, गौल, फूलधार, थान, नगाणगांव, खनेड़ा, भंसाड़ी, किसाला और स्यालना आदि गांवों के इस केंद्र में राजकीय इंटर कालेज, एलोपैथिक अस्पताल और सहकारी मिनी बैंक जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं। इन गांवों से बड़ी संख्या में लोग भी यहां आकर बस गए।
पिछले साल अगस्त में आयी बाढ़ से पहले तक खरादी एक हंसता खिलखिलाता कस्बा था, लेकिन न जाने किसकी नजर लगी कि यमुना के उफान ने सब तबाह कर डाला।
बाढ़ में तीस से अधिक बहुमंजिले होटल और दर्जनों घर बह गए। जो बचे भी हैं उन्हें यमुनोत्री राजमार्ग की बहाली के लिए ढहा देने का निर्णय लिया गया है। ऐसे में यहां रह रहे लोगों के सामने अब पलायन के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा है।
केस 1
गौल गांव निवासी मनमोहन बिजल्वाण पंडिताई करते हैं। खरादी में सुविधायें बढ़ी तो उन्होंने बच्चों को यहीं बसा दिया। गांव में खेतीबाड़ी का काम निबटाकर पूरा परिवार खरादी में ही रहता था। बाढ़ में सब तबाह होने के बाद अब यह परिवार फिर गांव लौट गया।
केस 2
खनेड़ा निवासी जगमोहन चौहान ने बड़ी मेहनत से एक-एक पैसा जोड़कर खरादी में होटल और मकान खड़ा किया। बाढ़ में सब तबाह हो गया। अब न सिर छिपाने का आसरा बचा और न रोजगार। फिर परिवार सहित गांव लौट गए।