जंगलों की आग से उपमंडल क्षेत्र के प्रख्यात देवालय तक सुरक्षित नहीं हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में अधिकांश मंदिर बांज, बुरांश और चीड़ से घिरे वनों के बीच स्थित हैं। लेकिन, अधिकांश मंदिरों में आग से सुरक्षा के लिए कोई भी उपाय नहीं हैं।
मंदिर समितियां दावानल से निपटने के लिए पूरी तरह से वन विभाग पर निर्भर हैं। पांडवों की अज्ञात स्थली पांडवखोली, शक्तिपीठ मानिला देवी हो या वैष्णवी शक्तिपीठ दूनागिरी मंदिर। सभी मंदिरों में आग से बचाव के कोई भी इंतजाम नहीं हैं। हालांकि अभी तक दावानल से बड़ी दुर्घटनाएं तो नहीं हुई हैं, लेकिन जंगल की आग कभी भी मंदिरों तक पहुंच गई तो बड़ी दुर्घटना हो सकती है।
देश के 51 शक्तिपीठों में से एक वैष्णवी शक्तिपीठ मां दूनागिरि मंदिर जंगल के बीच स्थापित है। साल भर यहां श्रद्धालुओं की चहल-पहल रहती है। लेकिन, दावानल से निपटने के लिए यहां भी पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। मंदिर की देखरेख का जिम्मा मंदिर ट्रस्ट के पास है।
सचिव जगदीश उपाध्याय का कहना है कि अभी तक दावानल की बड़ी दुर्घटनाएं तो नहीं हुई हैं, अलबत्ता दावानल से पूर्व ही वह लोग परिसर के चारों ओर सूखे पत्ते और कूड़े को निस्तारित कर लेते हैं। समस्या को देखते हुए ट्रस्ट के कर्मचारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए जाते हैं। आग से सुरक्षा के लिए उपकरण तक नहीं हैं।