चंबा (टिहरी)। वैश्विक ताप और जलवायु परिवर्तन के कारण पर्यावरण प्रभावित हो रहा है। सूर्य और पृथ्वी की विभिन्न गतियों से समुद्र की प्रतिक्रिया प्रभावित हो रही है। आधुनिक युग में मानव ने तीर्थ स्थानों का इस्तेमाल पिकनिक और सैर-सपाटे के रूप में शुरू कर दिया है। इससे मानव पारिस्थितिकी, जैव विविधता और प्राकृतिक संपदाओं को नुकसान पहुंच रहा है। यह बात शनिवार को एसआरटी परिसर बादशाहीथौल में भूगर्भ विभाग की ओर से जलवायु परिवर्तन और आपदा न्यूनीकरण पर आयोजित तीन दिवसीय संगोष्ठी में दूसरे दिन भूविज्ञान मंत्रालय दिल्ली के निदेशक डा. वीके गौलोत ने अपने शोध पत्र में पढ़ते हुए कही।
उन्होंने कहा कि आपदा के रूप में भूकंप का प्रभाव बढ़ रहा है। खास कर हिमालयी क्षेत्र में इसके प्रभाव में वृद्धि हुई है। उन्होंने भूकंप का पूर्वानुमान और उसके प्रभाव को कम करने की जानकारी साझा की। प्रो. एससी नैनवाल ने गढ़वाल क्षेत्र में भूकंप मापन और भूकंपीय लहरों के प्रभाव पर अपना शोध प्रस्तुत किया। प्रो. आरएस नेगी ने हिमालयी क्षेत्र में भारी वर्षा के कारण जन-जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव पर अपना शोधपत्र प्रस्तुत किया। ताइवान के वैज्ञानिक डा. मिनचिन तसाई ने कहा कि पर्यावरण परिवर्तन से केवल हिमालय क्षेत्र ही नहीं ताइवान और अन्य देश भी प्रभावित हो रहे हैं। इटली के प्रो. फेडोरा क्वाटोरोच्ची ने यूरोपीय देशों में कार्बन उत्सर्जन और उसके प्रभाव से हो रहे नुकसान पर अपना शोध प्रस्तुत किया। डा. मुकेश बिजल्वाण ने कहा कि पंजाब, कर्नाटक, उत्तराखंड के कुछ क्षेत्रों में यूरोनियम कि मात्रा डब्लूएचओ के मानकों से अधिक है। यूरोनियम कि अधिक मात्रा वाले पानी को पीने से परहेज करना चाहिए। इस मौके पर प्रो. अरुण सर्राफ , परिसर निदेशक प्रो. आरसी रमोला, प्रो. एससी नैनवाल, डा. दीपक भट्ट, डा. एनपी नैथानी, डा. कविता काला, डा. गुरूपत गुसाईं, डा. केके बंगवाल, डा. अर्चना बहुगुणा, डा. विवेक वालिया, डा. एपी पांडेय, डा. दुर्गा, किरन पाठनी, गरिमा पुनेथा, अशुतोष, सीपी पांडेय, पीएस नेगी, महीपाल भंडारी, अनूप थपलियाल, कमलेश्वर चमोली, डा. पदमा वशिष्ठ, डा. रजनी गुसाईं, डा. एसके नौटियाल, डा. पूर्णचंद्र, अमित कंडवाल, अंकिता शर्मा, आकाक्षा नौटियाल, अमित, डा. संजय सिंह राणा आदि मौजूद रहे।