केदारघाटी में गुप्तकाशी के देवशाल हेलीपैड पर लगा एनडीआरएफ का तंबू। तंबू में अपने-अपने कार्यों में मशगूल हैं। एनडीआरएफ, आईटीबीपी और सेना के जवान। लेकिन नजरें जब भटकती है तो वहां दिखते हैं प्रदेश के पुलिसकर्मी और राजस्व विभाग के अधिकारी। कोई नाश्ता कर रहा होता है तो कोई आराम फरमा रहा होता है।
पूछने पर पता चलता है कि शासन प्रशासन की ओर से इनके लिए न तो पर्याप्त मात्रा में तंबू की व्यवस्था की गई है और न ही नाश्ते भोजन की। नाश्ते से फारिग होने के बाद एक पुलिसकर्मी यह भी बताता है कि रोटेशन की व्यवस्था नहीं होने के कारण यहां आना उसे एक सजा लग रहा है।
उसको इस बात की इल्म भी है कि जब सेना की मुहिम खत्म होगी और ये तंबू उखड़ जाएंगे तो क्या होगा। उसकी बातों से लगता है कि सरकार की बेरुखी से अब उनका जज्बा पिघलने लगा है। आज उनकी आशंका भी सच साबित होने लगी है। एनडीआरएफ के तंबू उखड़ चुके हैं और घाटी में मौजूद सैकड़ों पुलिस कर्मियों और अधिकारियों से उनका सहारा छिन चुका है। ऐसे में इन पुलिसकर्मियों के लिए भी सिर छुपाना एक चुनौती बन गई है।
16 जून को केदार घाटी में आई दैवी आपदा के बाद से पूरी घाटी में बिजली नहीं है। केदारनाथ धाम में जब तक एनडीआरएफ और आईटीबीपी और आर्मी रही उसी के जनरेटर से वहां रात रोशन होती थी। लेकिन उनका अभियान अब समाप्त हो गया है। इसलिए उनके तंबू भी उखड़ गए।
उत्तराखंड आपदा की पल-पल अपडेट होती खबरों के लिए यहां क्लिक करें
घाटी में पहुंचे पुलिस कर्मियों और राजस्व विभाग के अधिकारियों के पास पर्याप्त मात्रा में अपना तंबू तक नहीं है। इतना ही नहीं भोजन आदि के लिए राशन की भी कमी है। यदि मौसम खराब हो गया तो हेलीकाप्टर से पहुंचाने वाला राशन की उम्मीद भी धरी की धरी रह जाती है। ऐसी स्थिति में वे सिर छुपाने से लेकर नाश्ता-भोजन तक के लिए भी एनडीआरएफ के तंबू में ही शरण लेते थे।
अब तक हाल यह रहा कि राहत कार्य के संचालन का केंद्र बने गुप्तकाशी के देवशाल हेलीपैड पर स्थित चारधाम कैंप के टेंट यहां तैनात प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के निवास थे। राहत शिविर बन चुके उसी के रेस्टोरेंट में ही उनका नाश्ता-भोजन होता था।
पुलिस कर्मियों से लेकर नोडल अधिकारी और एसडीएम तक के लिए यही रेस्टोरेंट ही पेट भरने का केंद्र है। वहीं पुलिस के बड़े अफसर एक-दो दिन यहां वक्त बिताने के बाद मौका हाथ लगते ही हेलीकाप्टर से देहरादून निकल जाते हैं। रि-फ्रेश होते हैं। घर-परिवार से मिलते हैं और फिर किसी हेलीकाप्टर से आ जाते हैं। लेकिन पोस्टमार्टम और दाह संस्कार के अलावा वहां की साफ-सफाई के लिए भेजे गए कर्मचारियों की लगातार वहीं बने रहने से अब हालत बिगड़ने लगी है।
ड्यूटी का रोस्टर नहीं
तैनाती का रोस्टर नहीं बनाने से घाटी में भेजे गए अधिकारी-कर्मचारी खुद को सजा मिलने जैसा महसूस करने लगे हैं। सरकार की बेरुखी का हाल यह है कि पीड़ितों तक कोई मदद पहुंचना तो दूर, जो अधिकारी-कर्मचारी पीड़ितों की मदद को भेजे गए हैं, उन्हें भी बुनियादी जरूरत की चीजें नहीं मुहैया हो रही हैं।
पीड़ितों के साथ ही अब इन कार्मिकों के भी भूखे रहने और ठंड में मरने की नौबत बन आई है। घाटी में पिछले 14 दिनों से सैकड़ों पुलिसकर्मी, राजस्व और प्रशासनिक अधिकारी-कर्मचारी केदारघाटी में राहत कार्यों में जुटे हैं। लेकिन अब इन्हें ही मदद की दरकार है। ये जिला अधिकारी से गुहार भी लगा रहे हैं।
प्रशासन यदि इनके लिए सामान भेजना भी चाहे तो उसके पास संसाधन नहीं है। राहत कार्यों में लगाए गए हेलीकाप्टर कहां उड़ रहे हैं और किसके आदेश-निर्देश पर चल रहे हैं, यह किसी को पता नहीं।