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अपनी ही नगरी से क्यों रूठे हैं भगवान शिव!

Sun, 30 Jun 2013 11:25 AM IST
वेद विलास उनियाल
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कभी भूकंप, कभी बाढ़, कभी भूस्खलन के रूप में बार-बार आती प्राकृतिक आपदा ने वरुणावत के आंचल में बसे सलोने से उत्तरकाशी-बाडाहाट का स्वरूप बदल दिया है।
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भगवान शिव की नगरी कहे जाने वाले उत्तरकाशी के लोग अब शिव को पुकार रहे हैं, कि कब तक हम त्रासदी सहते रहेंगे। हर बार प्राकृतिक प्रकोप सहता यह शहर क्या बचा भी रहेगा।

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उत्तरकाशी अपनी प्राकृतिक छटा के लिए तो जाना ही गया। रणसिंगा, ढोल-दमाऊं, मशकबीन पर भी यह शहर झूमा है। सैलानियों ने यहां शिव को अनुभव किया। गर्मियों में सैलानियों की चहल पहल, जाड़ों के माघ माह में बाडाहाट का थौलू(मेला), बरसात में सैलकू ने यहां हमेशा उल्लास जगाया।
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सावन की प्रतीक्षा इसलिए भी होती रही कि ऊंचे बुग्यालों से ब्रह्मकमल लाकर भगवान शिव का अभिषेक करेंगे। काली पटालों की छत और सुंदर नक्काशी वाले पहाड़ी शैली के घरों के आंगन में युवक-युवतियां तांदी, रांसौं, झौपती में झूमते रहे।

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मगर 1991 के भूकंप से यहां का जीवन बदल गया। 2003 में वरुणावत का प्रकोप अपने ही आंगन पर बरसा। रही-सही कसर पिछली बाढ़ और इस बार ऊंचे जल स्तर ने पूरी कर दी।

अब हर कोई घर ढहने, दीवाल दरकने, पुल बहने और खेतों के उजड़ने की बात कर रहा है। बरसात के शुरुआती काले बादल डराने लगती है। पिछली बार तो जो हुआ इस बार न जाने क्या होगा। 1991 की तबाही ने लोगों को किसी हद तक पंगु बना दिया है। किसी हद तक परंपरा से तोड़ दिया है।

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जो लोग ऊन के कपड़े सांपा, झगुली, मिरजई, वास्कट पहने सहज नजर आते थे। उन्होंने भी बाहरी कपड़े पहनना शुरू कर दिया। देखते उत्तरकाशी में भी कंक्रीट के जंगल खड़े हो गए। भागीरथी के प्रवाह को समझे बिना उसके तटों पर आशियाने बन गए। भूकंप ने भवन ढहाये जिंदगी छीनी, वरुणावत के पत्थरों ने आतंक ढहाया और भागीरथी में हलचल मची।

पिछले दो दशक से प्राकृतिक प्रकोप की काली छाया खड़ी है। प्रकृति को खूब छेड़ा गया। अब इस पौराणिक शहर को बचाने की चिंता है। सांसद माला राज्य लक्ष्मी शाह सुझाव देती हैं कि तटबंध लगाकर गंगा को बीचों-बीच लाया जाए।
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शहर के लोगों का कहना है कि अस्सी गंगा से उत्तरकाशी तक फोकस कर शहर को बचाया जाया। गंगोरी, बाडाहाट, तिलोथ, जोशियाडा, मातली खतरे में हैं। टिहरी को तो डुबोया पर कहीं उत्तरकाशी शहर को भी हम खो न दें।
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