उत्तराखंड में पिछले दिनों आई आपदा को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य में कोई भी नई पनबिजली परियोजना शुरू करने पर रोक लगा दी है। अदालत ने ऐसी परियोजनाओं से पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करने के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय और उत्तराखंड सरकार को निर्देश दिया कि अगले आदेश तक किसी भी पनबिजली परियोजना को पर्यावरण या वन संबंधी मंजूरी नहीं दी जाए। जस्टिस के एस राधाकृष्णन और दीपक मिश्रा की बेंच ने कहा कि हम हाल ही में हुई त्रासदी से बेहद चिंतित है जिसने उत्तराखंड के चार धाम इलाके को प्रभावित किया है और जिसकी वजह से बड़ी संख्या में लोगों की जान गई और संपत्ति का नुकसान हुआ है।
अदालत ने केंद्र सरकार को यह पता लगाने का निर्देश दिया है कि क्या 24 प्रस्तावित परियोजनाओं से अलकनंदा और भागीरथी नदियों के तट पर जैवविविधता पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है।
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पीठ ने कहा कि पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया जाता है जिसमें राज्य सरकार के साथ ही भारतीय वन्यजीव संस्थान, केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण, केंद्रीय जल आयोग और दूसरी विशेषज्ञ संस्थाओं के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाए जो विस्तृत अध्ययन करके यह पता लगाएं कि मौजूदा और निर्माणाधीन पन बिजली परियोजनाओं का पर्यावरण क्षरण में योगदान रहा है और यदि ऐसा है तो किसी सीमा तक यह हुआ है और क्या मौजूदा जून के महीने में उत्तराखंड में आई आपदा में इसका योगदान रहा है।
धारा देवी मंदिर को ऊंचाई पर स्थानांतरित करने का भी विरोध किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि श्रीनगर हाइड्रो इलैक्ट्रिक प्रोजेक्ट(शेप) का 95 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है। चार हजार करोड़ से ज्यादा धन निवेश किया जा चुका है। ऐसे में इस परियोजना पर किसी तरह का अंकुश ठीक नहीं है। लेकिन जून में हुई भयानक त्रासदी ने एक बात की ओर इशारा किया है कि कहीं विपदा का संबंध परियोजनाओं से तो नहीं है।
वाडिया इंस्टटीयूट ऑफ हिमालयन स्टडीज ने 15-16 जून को 350 एमएम बारिश की घोषणा पहले से कर दी थी। ऐसा लगता है कि बादल फटने से स्थिति गंभीर हुई। तीन महीने के भीतर एक रिपोर्ट दाखिल करके यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि क्या उसके पास राज्य के लिए कोई आपदा प्रबंधन योजना है और मौजूदा अप्रत्याशित त्रासदी से निबटने में यह योजना कितनी सक्षम है।
अदालत ने अलकनंदा हाइड्रो पावर कंपनी सहित तमाम कंपनियों की याचिकाओं का निबटारा करते हुये कहा कि राज्य के पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर मौजूदा, निर्माणाधीन और प्रस्तावित पन बिजली परियोजनाओं के प्रतिकूल प्रभाव का पता लगाने के लिये विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता है।
पीठ ने कहा कि पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को यह पता लगाने का निर्देश दिया जाता है कि क्या प्रस्तावित 24 परियोजनाएं अलकनंदा और भागीरथी नदी की घाटियों की जैवविविधता को प्रभावित कर रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड में ‘कुकुरमुत्ते’ की तरह पनबिजली परियोजनाओं के आने और अलकनंदा तथा भागीरथी नदी की घाटियों पर पड़ रहे प्रभाव पर चिंता व्यक्त की है। अदालत ने कहा कि तमाम अध्ययनों से भी यही संकेत मिलता है कि भागीरथी और अलकनंदा नदियों और उनकी सहायक नदियों सहित ऊपरी गंगा के इलाके में अनेक छोटी और बड़ी पन बिजली परियोजनायें हैं।
इन परियोजनाओं के लिए बांध, सुरंग बनाने, विस्फोट, बिजली घर, गाद के निष्पादन, खनन और वनों की कटाई आदि के समग्र प्रभाव का वैज्ञानिक परीक्षण अभी होना है।गौरतलब है कि अनुज जोशी और भरत झुनझुनवाला ने अलकनंदा हाइड्रो पावर कंपनी की ओर से टिहरी गढ़वाल जिले में 200 मेगावॉट की क्षमता को 330 मेगावाट बढ़ाने के निर्णय को उत्तराखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उन्होंने सीबीआई जांच की मांग की थी।
पहले से बंद प्रोजेक्ट
480 मेगावाट की पाला मनेरी जल विद्युत परियोजना
एनटीपीसी की 600 मेगावाट की लोहारी-नागपाला
जल विद्युत निगम की 381 मेगावाट की भैरोघाटी
बंद प्रोजेक्ट पर खर्च
पाला मनेरी पर 100 करोड़
लोहारी नागपाल पर 700 करोड़
भैरोघाटी पर 2 करोड़ (सर्वे चरण में ही)