जन्माष्टमी पर्व पर इस बार 17 साल बाद श्रद्धालुओं को नक्षत्र, वार और तिथि के अद्भुत संयोग का शुभ फल प्राप्त होगा। इस बार इन तीनों का वही मिलन हो रहा है, जो भगवान कृष्ण के जन्म के दिन था।
ऐसे में इस बार वैष्णव और स्मार्त (गृहस्थ) एक ही दिन 28 अगस्त को पर्व मनाएंगे। उत्तराखंड विद्वत सभा के उपाध्यक्ष आचार्य भरतराम तिवारी बताते हैं कि भगवान के जन्म समय में रात्रि 12 बजे अष्टमी तिथि बुधवार एवं रोहिणी नक्षत्र का योग था।
17 साल बाद आया दुर्लभ योग
ऐसा योग अनेक वर्षो के बाद सुलभ होता है। इस बार 28 अगस्त को अष्टमी तिथि प्रात: दो बजकर 15 मिनट पर प्रारंभ होगी, जो 29 अगस्त की प्रात: चार बजकर 07 मिनट तक रहेगी।
रोहिणी नक्षत्र 28 अगस्त को दिन में 12.28 मिनट से प्रारंभ होकर 29 को मध्याह्न 3 बजकर 16 मिनट तक रहेगा। चंद्रोदय 28 की रात्रि 11.32 मिनट पर होगा।
विष्णु लोक की प्राप्ति
जन्माष्टमी यदि रोहिणी नक्षत्र और बुधवार से संयुक्त हो तो वह जयंती नाम से जानी जाती है। बताया कि जयंती योग वाली अष्टमी का व्रत करने से विष्णु लोक की प्राप्ति होती है।
वैष्णव, स्मार्त का अलग-अलग पर्व
भाद्रपद मास के अंधकारमय कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का अर्द्धरात्रि में प्रादुर्भाव होना निराशा में आशा का संचार है। इस व्रत के विषय में दो मत हैं।
स्मार्त (गृहस्थ) लोग अर्द्धरात्रि में रहने वाली अष्टमी में उपवास करते हैं, जबकि वैष्णव (संत) उदयव्यापिनी अष्टमी में व्रत करते हैं।
क्या कहतें हैं आचार्य
ऐसा योग चार सितंबर 1996 में बना था। इस वर्ष उदयव्यापिनी अष्टमी तिथि रात्रिपर्यंत रहेगी। अर्द्धरात्रि रोहिणी में अष्टमी तिथि मिल जाए तो इसमें श्रीकृष्ण का पूजन करने से तीन जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। जयंती योग वाली जन्माष्टमी का योग कई वर्षों के बाद मिलता है। सभी धर्मग्रंथों में ऐसे दुर्लभ योग की विशेष महिमा है।
-डा. सुशांत राज, आचार्य शनिधाम मंदिर