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उत्तराखंडः किशोर प्रदेश की कलंक कथाएं

Sat, 09 Nov 2013 02:04 PM IST
अजित सिंह राठी/ अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड में जिन लोगों पर भ्रष्टाचार से लड़ने की जिम्मेदारी थी, उन्हीं के दामन दागदार निकले।
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जांचों की रस्मअदायगी हुई, लेकिन न तो किसी पर आंच आनी थी, न ही किसी पर आई। अलबत्ता नूराकुश्ती खूब लड़ी गई।

बारी-बारी से सत्ता में रही भाजपा और कांग्रेस ने एक दूसरे को बचाने का ही काम किया। करोड़ों खर्च के बावजूद ना कोई दोषी कानून की गिरफ्त में आया और ना ही किसी ने सबक लिया।

उम्रदराज प्रदेशों को पीछे छोड़ा
राज्य की उम्र बेशक कम हो लेकिन भ्रष्टाचार के मामलों में उम्रदराज राज्यों को भी पीछे छोड़ दिया। 13 सालों में दर्जनों घोटालों ने प्रदेश को पीछे धकेला। यदि हम राजनीतिक नजरिये को ही सामने रखें तो सियासी मिलीभगत का लंबा सिलसिला सामने है। 2007 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का मुख्य चुनावी मुद्दा कांग्रेस सरकार के 56 घोटालों का था।
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भाजपा ने चुनाव में जनता से वायदा किया था कि सत्ता में आते ही आयोग गठित कर तीन महीने के भीतर जांच पूरी कराकर दोषियों को सजा देंगे। जांच आयोग गठित हुए, तीन करोड़ रुपया खर्च हुआ। लेकिन ना जांच पूरी हुई और ना ही किसी को सजा मिली। और, 56 घोटालों का डर दिखाकर भाजपा ने अपने पांच साल पूरे कर डाले।

कांग्रेस भी भाजपा की राह पर
2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का मुख्य मुद्दा भाजपा के पांच साल के घोटाले ही थे। कांग्रेस ने भी वायदा किया था कि सैफ विंटर गेम से लेकर महाकुंभ, सिटूर्जिया घोटालों के लिए अलग से जांच आयोग गठित होगा और छह महीने भीतर दोषियों को चिन्हित कर अभियोजन चलाया जाएगा।
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पहले भाटी आयोग बना, आयोग के अध्यक्ष केवल राम भाटी को किन्हीं राजनीतिक कारणों से इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद उनकी जगह त्रिपाठी आयोग गठित हुआ। इस मामले में कांग्रेस भी भाजपा की राह पर है। सत्ता में आए दो साल बीत गए लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा।

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