उत्तराखंड में मूलभूत सुविधाओं की बात करें तो विकास सिर्फ मैदानी जनपदों तक ही सीमित है।
एक तो कमजोर सियासी इच्छाशक्ति, ऊपर से साल दर साल आपदा के कहर से पर्वतीय जनपदों में लोगों को उन्हीं मुश्किल हालात से गुजरना पड़ रहा है जैसे 13 बरस पहले थे।
पहाडों पर हालात जस के तस
राज्य में सड़कों का जाल फैलकर 28 हजार किलोमीटर तो जरूर हुआ लेकिन पहाड़ों में पहले की तरह आज भी लोगों को कई कोस पैदल चल अपनी मंजिल तक पहुंचना पड़ रहा है।
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स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर 17 सौ हेल्थ सेंटर, तीन सौ से अधिक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, लगभग 60 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र खुले, लेकिन मरीजों के इलाज के लिए डॉक्टर की तलाश मैदानी जनपदों में आकर ही खत्म होती है।
प्राथमिक शिक्षा मुहैया करवाने के लिए के लिए गांव-गांव में स्कूल की बात भी तब बेमानी हो जाती है जब स्कूलों में मास्टर ही नहीं तैनात किए जाते। पेयजल और बिजली की लाइन तो लगभग हर गांव तक पहुंचाई गई।
पर्वतीय जनपदों में तैनात ही नहीं होना चाहते कर्मचारी
99 फीसदी पेयजल सप्लाई और 98 फीसदी बिजली सप्लाई का दावा तब कागजी लगता है जब नलों में पानी नहीं आता और बल्ब सिर्फ दिन के कुछ घंटे टिमटिमाता है। हालात यह है कि मूलभूत सुविधाओं के नाम पर ढांचा तो सरकार बनाने का प्रयास कर रही है लेकिन पहाड़ के नाम पर बने उत्तराखंड में अब कर्मचारी पर्वतीय जनपदों में तैनात ही नहीं होना चाहते।
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राजनेता भी ऐसे हैं कि कर्मचारियों के स्थानांतरण को लेकर आज तक कोई ठोस नीति नहीं बना पाए। स्कूल और अस्पताल जैसी मौलिक जरूरत को पूरा करने के लिए न तो सरकारें पहाड़ों पर डाक्टर भेज पाने में सरकार कामयाब हो पाई है न ही मास्टरों को।
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