आपदाओं की दृष्टि से अति संवेदनशील राज्य में आपदाएं कभी चुनावी मुद्दा नहीं बन पाई है। केदारनाथ आपदा के आठ वर्ष बाद भी क्षेत्र में सुरक्षा के इंतजाम नाकाफी हैं, लेकिन किसी भी पार्टी या प्रत्याशी ने इस विषय पर बात नहीं रखी है।
केदारनाथ आपदा ने तो पूरे जिले के भूगोल को बदलकर रख दिया था, लेकिन आठ वर्ष बाद भी प्रभावित गांवों में सुरक्षा के ठोस इंतजाम नहीं हो पाए हैं। विस्थापन की आस में ग्रामीण आज भी दरारों से पटे घरों में जीवन यापन करने को मजबूर हैं। स्थिति यह है कि केदारनाथ पुनर्निर्माण के तहत केदारपुरी को तो सुंदर व भव्य बनाया जा रहा है, लेकिन यात्रा पड़ाव गौरीकुंड बदहाल है। साथ ही गौरीकुंड-केदारनाथ पैदल मार्ग भी सुरक्षित नहीं हैं।
वर्ष 1976 से 2013 के बीच 13 बड़ी आपदाओं ने यहां के जनजीवन को व्यापक प्रभावित किया है। लेकिन उत्तराखंड राज्य निर्माण के बाद भी विधानसभा चुनाव में आपदा कभी चुनावी मुद्दा नहीं बन पाई है। प्रभावितों की बातें कागजी फाइलों में रुद्रप्रयाग से देहरादून के चक्कर लगा रही हैं। जिला पंचायत सदस्य विनोद राणा, ग्राम प्रधान योगेंद्र नेगी, कुंवर सिंह बजवाल, व्यापार संघ अध्यक्ष अरविंद गोस्वामी का कहना है कि विस्थापन सूची में शामिल गांवों के लोग आज भी रतजगा कर रहे हैं।
विस्थापन के इंतजार में कई गांव
केदारनाथ आपदा के बाद जिले में भू-वैज्ञानिकों ने राजस्व विभाग की मदद से 23 गांवों के 472 परिवारों को विस्थापन की सूची में शामिल किया था। वहीं, बीते दो वर्षों में भूस्खलन व भूधंसाव से पीड़ित तुुंगनाथ घाटी के उषाड़ा सहित अन्य प्रभावित चार गांवों के 76 और परिवारों को भी सूची में शामिल किया गया है, लेकिन आठ वर्षों में अभी तक सिर्फ 7 गांवों के 56 परिवारों का ही उनकी भूमि पर अन्यत्र विस्थापन हो पाया है।
रुद्रप्रयाग में आई आपदाएं
वर्ष हादसा
1976 भूस्खलन से ऊपरी क्षेत्रों में मंदाकिनी का प्रवाह अवरुद्ध।
1979 क्यूंजा गाड़ में बाढ़ से कोंथा, चंद्रनगर और अजयपुर क्षेत्र में तबाही। 29 लोग मरे।
1986 जखोली तहसील के सिरवाड़ी में भूस्खलन, 32 मरे।
1998 भूस्खलन से भेंटी और पौंडार गांव ध्वस्त। साथ ही 34 गांवों में जनधन की हानि। 103 लोगों की मौत।
2001 ऊखीमठ के फाटा में बादल फटा, 28 मरे।
2002 बड़ासू और रैल गांव में भूस्खलन।
2003 स्वारीग्वांस में भूस्खलन।
2004 घंघासू बांगर में भूस्खलन।
2005 बादल फटने से विजयनगर में तबाही, चार की मौत।
2006 डांडाखाल क्षेत्र में बादल फटा।
2008 चौमासी-चिलौंड गांव में भूस्खलन। एक युवक मरा और कई मवेशी मलबे में दबे।
2009 गौरीकुंड घोड़ा पड़ाव में भूस्खलन, दो श्रमिक मरे।
2010 कई स्थानों पर बादल फटे, एक युवक बहा
2012 ऊखीमठ गांवों में बादल फटा, 64 लोग मरे।
2013 केदारनाद आपदा में हजारों मरे, पूरी केदारघाटी प्रभावित।