अगस्त्यमुनि। क्षेत्रांतर्गत आयोजित रामलीला महज मनोरंजन का साधन मात्र नहीं है, बल्कि इसमें महाऋषि अगस्त्य और पुरुषोत्तम श्रीराम के बीच के संबंधों को दिखाया जाता है। रामायण के अरण्यकांड और अन्य कांडाें में भी श्रीराम और अगस्त्य ऋषि के बीच के संबंधाें का विस्तृत वर्णन मिलता है। इनके अनुसार वनवास के दौरान महर्षि अगस्त्य ने ही भगवान राम को धर्मयुद्ध के लिए दिव्य अस्त्र-शस्त्र और रामसेतु निर्माण हेतु जल विखंडन की विधि प्रदान की थी।
धर्म ग्रंथाें के अनुसार जब भगवान श्रीराम वनवास अवधि में थे, तो इसी दौरान उनकी भेंट महर्षि अगस्त्य से हुई थी। भगवान के प्रयोजन को समझते हुए महर्षि ने ही उन्हें धर्मयुद्ध के लिए दिव्य वैष्णव धनुष, सूर्यसमान तेजस्वी धनुष, तीक्ष्ण बाणाें वाले तूरीण, महाखड्ग और अमोघ कवच प्रदान किया था।
इसके अलावा लंका चढ़ाई के दौरान रामसेतु निर्माण के लिए जल विखंडन विधि का ज्ञान भी महर्षि ने श्रीराम को दिया था। रावण वध के बाद स्वयं को ब्रह्महत्या का भागी समझकर मूर्च्छित राम को महर्षि अगस्त्य ने ही संज्ञा लेकर ज्ञान प्रदान किया था। इसके अलावा राजस्यू यज्ञ व राज्याभिषेक में भी मंदाकिनी घाटी के राजाआें द्वारा ही स्वर्ण बालू भेंट की गई थी।
अगस्त्यमुनि में रामलीला का आयोजन वर्ष 1945 में घाटी के नाकोट, बनियाड़ी, धान्यू, सौड़ी, रूमसी, डोभा, भौसाल, चौंड, बावई, भट्टगांव, बेंजी, गंगतल, सिल्ली, चाका, फलाटी, गदनू, जखन्यालंगाव, तिमली, सिल्ला, फलई, रायड़ी समेत चार दर्जन से भी अधिक गांवों द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था।
विभिन्न रागाें में गाई जाती रामलीला
अगस्त्यमुनि। लंबे समय से रामलीला से जुड़े राजेंद्र गोस्वामी बताते हैं कि विविध रागों में गाए जाने वाली श्री अगस्त्य रामलीला कई मायनों में बेहद खास है। रामलीला में यमन, विहाग, जयदेवंती, खम्भाज, मालकोस, भूपाली, बागेश्वरी, द्वेष, राजदीपक और केदार राग का प्रयोग किया जाता है।