इन दीयों को पहले मिट्टी से बनाया गया। फिर जलने के लिए मोम का भी प्रयोग किया गया है। एक दीये की कीमत 60 रुपये है। जबकि, स्थानीय स्तर पर बिक्री के लिए पांच से 50 रुपये की कीमत तक के दीये बनाए गए हैं। शेरू प्रजापति ने बताया कि इस बार मिट्टी के दीयों की मांग अधिक है। इसलिए दिन-रात दीये बनाए जा रहे हैं।
कुंजा बहादुरपुर के कुम्हारों की कलाकारी के साथ यहां की मिट्टी की भी अलग ही बात है। बताया जाता है कि इस गांव की दोमट मिट्टी के जैसे बर्तन कहीं और की मिट्टी से नहीं बनते। अन्य गांवों के कुम्हार भी इस गांव से मिट्टी लेकर जाते हैं। कुम्हारों ने अलॉट कराए गए मिट्टी के रकबे को तारबाड़ से कवर कर रखा है। इसमें से मिट्टी की खोदाई की जाती है।
हाईटेक तरीके से बनाए जा रहे हैं दीये और बर्तन
कुछ समय पहले तक मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए चाक में डंडा लगाकर हाथ से घुमाना पड़ता था, लेकिन अब चाक भी हाईटेक हो गए हैं। ये चाक बिजली की मोटर से चलते हैं। पहले वाले चाक से मॉडर्न चाक तीन गुना ज्यादा काम करता है। इससे उत्पादन दर भी बढ़ गई है। हाईटेक चाक से मिट्टी के बर्तन और दीये बनाने का रुझान युवाओं में भी देखा जा रहा है।