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87 साल की वृद्धा बनी 72 साल के बीमार दिव्यांग बेटे का सहारा

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87वर्षीय लछिमा देवी अपने बीमार दिव्यांग बेटे के साथ। संवाद - फोटो : PITHORAGARH
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पिथौरागढ़। बेटे माता-पिता के बुढ़ापे की लाठी होते हैं लेकिन पिथौरागढ़ के एक गांव में 87 साल की वृद्धा को अपने 72 साल के दिव्यांग और बीमार बेटे का सहारा बनना पड़ रहा है। खाना खिलाने से लेकर शौच के लिए भी बूढ़ी मां ही उसे खेतों में ले जाती है। वृद्धावस्था पेंशन के रुपयों से केवल खाने का ही इंतजाम हो पाता है। बेटे की दवा के लिए लोगों से मदद मांगनी पड़ती है। यह बेघर मां-बेटे पिछले दस वर्षों से गांव में ही दूसरे व्यक्ति के घर में रहने के लिए मजबूर हैं।
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जिला मुख्यालय से करीब 10 किमी की दूरी पर स्थित रावलगांव के नायल तोक निवासी 87 साल की लछिमा देवी के चार बेटे हैं। सबसे बड़ा बेटा गोविंद दिव्यांग और बीमार है। तीन बेटे मजदूरी करते हैं और अपने परिवार के साथ अलग घरों में रहते हैं। ग्रामीणों ने बताया कि बड़े बेटे गोविंद के दिव्यांग होने के कारण लछिमा पहले से ही उनके साथ रहतीं हैं। मां ने दिव्यांग बेटे का विवाह भी कराया लेकिन प्रसव के दौरान गोविंद की पत्नी का अस्पताल में निधन हो गया। दमा होने के कारण दिव्यांग गोविंद के शरीर में सूजन आ गई। अब वह चल भी नहीं पाते। इसलिए बूढ़ी लछिमा की जिम्मेदारी भी बढ़ती गई। छोटे से पुश्तैनी मकान में तीन बेरोजगार बेटों का परिवार रहने के कारण गांव की ही एक महिला ने रहने के लिए उन्हें अपने मकान में एक कमरा दे दिया। दोनों मां-बेटे उसी कमरे में पिछले दस साल से रह रहे हैं। मां-बेटे का गुजारा वृद्धावस्था और दिव्यांग पेंशन से होता है, लेकिन गोविंद को पिछले काफी समय से पेंशन नहीं मिली है। वृद्धावस्था पेंशन से केवल खाने भर का इंतजाम हो पाता है। गरीबी के कारण गोविंद को इलाज भी नहीं मिल पा रहा है। ठीक से न दिखने और चल नहीं पाने के बावजूद लछिमा राशन-पानी से लेकर, चूल्हे में खाना बनाने के लिए आसपास के जंगल से सूखी लकड़ियां भी स्वयं तोड़कर लाती हैं। कभी कभार मां-बेटे को भूखा ही सोना पड़ता है। डॉक्टर कहते हैं कि गोविंद को अनार का जूस और फल खिलाओ लेकिन उन्हें दाल, रोटी मिलना भी मुश्किल हो रहा है। उनके एक पोते रवींद्र कुमार ने बताया कि उनका पूरा परिवार बेरोजगार है। इसके बाद भी वह बूढ़ी दादी और बीमार ताऊ की हरसंभव मदद करते हैं।
बीमार बेटे के लिए परचून और रेडीमेड की दुकानों में ढूंढ रही थी फल
पिथौरागढ़। मोतियाबिंद होने के कारण लछिमा देवी को आंखों से धुंधला दिखता है। तीन-चार दिन पूर्व लछिमा बेटे की दवा और फल ले जाने के लिए पिथौरागढ़ बाजार आई थी। नजर कमजोर होने के कारण वह परचून और कपड़ों की दुकानों में फलों के लिए पूछताछ कर रही थी। इससे लोगों को उनकी दयनीय स्थिति का पता चला। जनमंच के संयोजक भगवान रावत, सामाजिक कार्यकर्ता दीपक जोशी, रेखा पांडेय, तीलू रौतेली पुरस्कार से सम्मानित हेमा थलाल ने रविवार को गांव पहुंचकर उन्हें राशन, फल, जूस दिलाया।
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वृद्ध और दिव्यांगों को पेंशन दी जाती है। यदि दिव्यांग गोविंद राम की पेंशन किसी कारण से रुकी है तो इसका पता कर खाते में पेंशन की राशि भेजी जाएगी। लछिमा देवी और उनके बेटे गोविंद राम को विभाग की ओर से हरसंभव मदद दिलाई जाएगी। - दिलीप कुमार, प्रभारी समाज कल्याण अधिकारी, पिथौरागढ़।
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