अस्कोट (पिथौरागढ़)। चुनावों में दावे तो बहुत होते हैं लेकिन विकास के दावों की हकीकत को गांवों के हालात खुद ही बयां कर देते हैं। इसी तरह की तस्वीर कनालीछीना विकासखंड के अस्कोट से सटे गांवों की भी है। यहां के आधा दर्जन गांव ऐसे हैं, जहां के ग्रामीणों की सुरक्षित आवाजाही के लिए एक पुलिया की सुविधा तक नहीं है। बरसात में अपने उग्र रूप में बहने वाली गुरजीगाड़ हर साल दो-तीन लोगों को अपने साथ बहा ले जाती है। तमाम संकटों से जूझते हुए क्षेत्र के 80 से अधिक परिवार पलायन कर चुके हैं। क्षेत्र के जिन दो प्राथमिक स्कूूलों में कभी 50-50 से अधिक छात्र संख्या होती थी उन स्कूलों में पांच-छह सालों से ताले लटक रहे हैं।
कनालीछीना विकासखंड के पातलीगांव, घट्यूड़ी, पसमा, गजाली, मौचोरा, बिजौरी गांव पाल राजाओं की राजधानी रहे अस्कोट से सटे हुए हैं। इन गांवों की दूरी सड़क से तीन से चार किलोमीटर है। किसी को अस्पताल ले जाना हो तो डोली में रखकर ही सड़क तक पहुंचाना होता है। खरीदारी, बैंक, स्कूल सहित तमाम कार्यों के लिए ग्रामीणों को प्रतिदिन अस्कोट और जौलजीबी आना पड़ता है। अस्कोट और इन गांवों के बीच में गुरजीगाड़ पड़ती है।
बरसात में यह गुरजीगाड़ रौद्र रूप ले लेती है। इसके बावजूद आज तक इसमें एक पुलिया तक नहीं बनाई गई है। हर साल बरसात में दो से तीन लोग इस गुरजीगाड़ में बहकर असमय मौत के मुंह में समा जाते हैं। पुल की सुविधा नहीं होने के कारण कभी स्कूली बच्चे तो कभी घास काटकर लौट रही महिलाएं या फिर ग्वाले इस गुरजीगाड़ में समा जाते हैं। सबसे दुखदायी बात यह है कि स्थिति की जानकारी के बाद भी इन ग्रामीणों का दर्द किसी ने नहीं देखा।
वीरान घरों के आंगन में उग आई हैं कंटीली झाड़ियां
अस्कोट। नौकरी, शिक्षा, सुविधा सहित तमाम कारणों से क्षेत्र के कई गांवों में दर्जनों परिवार पलायन कर गए हैं। पलायन से बंद पड़े घरों की छतें जर्जर हो चुकी हैं और आंगन में कंटीली झाड़ियां उग आई हैं। अक्सर इन बंजर मकानों में जंगली जानवरों के भी डेरा डालने का खतरा रहता है। अब जो परिवार गांवों में रह गए हैं वह भी जंगली जानवरों की समस्या, स्वास्थ्य सुविधा नहीं होने, बच्चों के लिए स्कूल सहित तमाम परेशानियों से जूझ रहे हैं।
बेड़ा मौचोरा, पातलीगांव स्कूल सालों से बंद
अस्कोट। अधिकतर परिवारों ने सुविधाओं की चाह में पलायन किया तो छात्र संख्या कम होने से स्कूल भी बंद हो गए। यही स्थिति इस क्षेत्र के प्राथमिक पाठशाला बेड़ा मौचोरा और पातलीगांव स्कूलों की भी है। यह दोनों स्कूल पांच-छह साल से बंद पड़े हैं। स्कूल बंद होने से इन गांवों के बच्चों को दूसरे गांवों के स्कूलों में जाना पड़ रहा है।
पलायन से अधिकतर गांव खाली हो गए हैं। जमीनें बंजर पड़ चुकी हैं। युवाओं के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार की कोई सुविधा नहीं है। उचित रास्ते और पुल तक नहीं बन पाए हैं। जान जोखिम में डालकर आवाजाही करते समय बरसात में कई लोग नदी नालों में बह जाते हैं। - तारा सिंह बिष्ट, पूर्व प्रधान रसगाड़ी।
तारा सिंह बिष्ट, पूर्व प्रधान रसगाड़ी।
93 की उम्र हो गई है। कभी इन गांवों में चहल पहल रहा करती थी। सुविधाओं के अभाव में अधिकतर लोग शहरों में चले गए हैं। जो परिवार गांव में रह रहे हैं उनके लिए सरकारों को जरूरी सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए। नेता लोग केवल चुनावों में ही गांवों में आते हैं। - तुलसी देवी।
तुलसी देवी।
गुरजीगाड़ में पुलिया नहीं होने से हर साल लोग बह जाते हैं। बरसात में जरूरी काम होने पर घंटों तक जल स्तर कम होने का इंतजार करना पड़ता है। कभी-कभी 15 किलोमीटर घूमकर सिंगाली-ओगला से आवाजाही करनी पड़ती है। पुल बनता तो क्षेत्र के कई गांवों के लोगों को सुविधा मिलती। - मुन्नी धामी, गदाली।
मुन्नी धामी, गदाली।
गांवों में अच्छे रास्ते नहीं हैं। गुरजीगाड़ में पुल नहीं होने से सबसे अधिक परेशानी उठानी पड़ती है। बरसात के मौसम में जनजीवन अस्त व्यस्त हो जाता है। क्षेत्र के दो-दो स्कूल बंद हैं। बच्चों की सुविधा के लिए इन बंद पड़े स्कूलों का संचालन शुरू किया जाना चाहिए। - ललित आर्या, पातलीगांव।
ललित आर्या, पातलीगांव।
पक्ष
विधानसभा क्षेत्र में गांवों को सड़कों से जोड़ने का कार्य प्रमुखता से किया है। जिन गांवों में पेयजल संकट था वहां तक पानी की योजनाएं बिछाई गई हैं। अधिकांश गांवों में हर घर नल योजना के तहत पानी पहुंचाया जा रहा है। पलायन रोकने के लिए युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ा जा रहा है। - बिशन सिंह चुफाल, कैबिनेट मंत्री एवं भाजपा प्रत्याशी।
विपक्ष
डीडीहाट विधानसभा क्षेत्र में कोई विकास कार्य नहीं हुए हैं। असुविधाओं के कारण लोगों ने गांवों से बड़ी संख्या में पलायन किया है। तमाम गांवों में सड़क, पेयजल सहित तमाम समस्याएं व्याप्त है। विकास के नाम पर आज तक केवल लोगों को छलने का काम किया है। - प्रदीप पाल, प्रत्याशी कांग्रेस।