पंचाचूली ग्लेशियर की पांच-छह साल पूर्व की फोटो
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एक सप्ताह तक दारमा घाटी में रहकर वापस लौटने पर पूर्व आईएफएस और उत्तराखंड राज्य वन्य जीव बोर्ड के सदस्य बिशन सिंह बोनाल ने पंचाचूली चोटी में बर्फ कम दिखने पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि 20-25 साल पूर्व पंचाचूली की पांचों चोटियां बर्फ से लकदक रहती थीं। बर्फ ज्यादा होने पर दोपहर में बर्फीली हवाएं चलती थीं। बर्फ गिरने के दौरान न्योला नदी में काफी आवाजें आती रहती थीं। कहा कि वर्तमान समय में पंचाचूली की चोटियों में बर्फ कम होने से अब यह सब देखने को नहीं मिल रहा है।
उन्होंने कहा कि जब से दारमा घाटी सड़क मार्ग से जुड़ गया है तब से दारमा घाटी के पर्यावरण में काफी बदलाव देखने को मिल रहा है। ग्राम सोन निवासी राम सिंह सोनाल ने भी पंचाचूली की चोटियों में बर्फ कम होने के साथ ही अन्य मौसमी बदलाव पर चिंता जताई।
जलवायु परिवर्तन का असर हमारे उच्च हिमालय क्षेत्रों में देखने को मिल रहा है। बढ़ती गर्मी और बदलते मौसम से बर्फबारी में भारी कमी आई है। कुछ सालों से पर्यटन और गाड़ियों की आवाजाही ने गति पकड़ी है। प्रदूषण के चलते पहले से पहाड़ों में जमी ग्लेशियर की बर्फ तेजी से से गल रही है। काफी मात्रा में ब्लैक कार्बन ग्लेशियर तक पहुंच रहा है। सीबीटीएस की टीम पिछले 7-8 सालों से इस क्षेत्र के ग्लेशियरों को करीब से देख रही है जिस गति से यह सिकुड़ते जा रहे हैं वह चिंतनीय है।
- योगेश गर्ब्याल, माउंट एवरेस्ट विजेता