पिथौरागढ़। जिले में घटते वन क्षेत्र को फिर से विस्तार देने की मुहिम शुरू हो गई है। अब जापान की मियावाकी तकनीक से जंगल विकसित हो रहे हैं। उत्तराखंड वन अनुसंधान ने मुनस्यारी में इस तकनीक से 0.16 हेक्टेयर दायरे में जंगल विकसित किया है। खासियत यह है कि जंगल में स्थानीय प्रजाति के पेड़-पौधे मौजूद हैं।
मुनस्यारी में उत्तराखंड वन अनुसंधान केंद्र ने जुलाई 2021 में मियावाकी तकनीक से जंगल विकसित करने का काम शुरू किया। इसका सुखद परिणाम सामने आया है। वर्तमान में यहां 0.16 हेक्टेयर दायरे में इस तकनीक से विकसित जंगल में हरे-भरे पेड़-पौधे लहलहा रहे हैं।
बुरांश, थुनैर, बांज, कठभोज, अखरोट, किलमोड़ा, घिघांरू, चिल्ल, देवदार, पदम, उतीस सहित 40 प्रजातियों के पेड़-पौधों से यह जंगल विकसित किया गया है।
वन दरोगा प्रदीप जोशी ने बताया कि मियावाकी तकनीक कम समय में जंगल विकसित करने की एक तकनीक है जो बेहद लाभकारी सिद्ध हो रही है। इस तकनीक से अन्य क्षेत्रों में जंगल विकसित किए जाएंगे।
कम समय में विकसित किया जा सकता है वन
पिथौरागढ़। जंगलों में पौधों को विकसित होने में लंबा समय लगता है। मियावाकी तकनीक से सिर्फ 10 से 15 वर्षों में ही जंगल विकसित किया जा सकता है। इस प्रक्रिया में पौधों की वृद्धि 10 गुना अधिक तेजी से होती है। तैयार वन भारी बारिश में भी मिट्टी को बहने से रोकने का काम करता है। इसकी वजह पेड़-पौधों को एक-दूसरे के बेहद करीब विकसित करना है इनकी जड़ मिट्टी को जकड़े रखती है।
यह है मियावाकी तकनीक
पिथौरागढ़। माना जाता है कि जापान के पर्यावरणविद् डॉ. मियावाकी ने यह तकनीक विकसित की। इसकी खासियत यह है कि संबंधित जमीन पर वहीं की स्थानीय वनस्पति को बढ़ावा दिया जाता है, ताकि अनुकूल आबोहवा, जलवायु, मौसम व मृदा इन पौधों के विकास में मददगार बन सके। इसमें पौधों की बढ़वार तेजी से होती है और इनके मरने की संभावना बेहद कम हो जाती है। इस तकनीक में पहले गड्ढे खोदकर कुछ महीने के लिए छोड़ दिए जाते हैं। बाद में उसमें दालों, गोबर और भूसे से बनी जैविक खाद डालकर पौधरोपण होता है। संवाद
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पिथौरागढ़ के प्रभागीय वनाधिकारी आशुतोष सिंह का कहना है कि मुनस्यारी में मियावाकी तकनीक का पहला प्रयोग किया गया, इसका परिणाम भी अच्छा मिला है। कम ऊंचाई वाले इलाकों में इस तकनीक से मिश्रित प्रजाति के जंगल विकसित करने की योजना बनाई जा रही है।