गणाई गंगोली (पिथौरागढ़)। जी हां, बिलकुल सही पढ़ा आपने। बनकोट के अधिकतर लोगों के उच्च पदों पर आसीन होने से ये धारणा आम है कि नाम में बनकोटी जुड़ा है तो व्यक्ति किसी बड़े पद पर होगा ही। गणाईगंगोली से 12 किमी दूर पश्चिम की ओर जाने पर आपको मिलेगा बनकोट गांव। इस गांव को खास बनाते हैं यहां के लोग। बेहद दुर्गम इस गांव के लोग पायलट, सीबीआई कमिश्नर, शिक्षाधिकारी, सर्जन, एसडीएम, इंजीनियर, डॉक्टर, सैन्य अधिकारी आदि बन चुके हैं। गांव में शायद ही आपको कोई घर ऐसा मिले, जिसके लोग उच्च पदों पर आसीन न हों।
कहते हैं न समाज और आसपास का परिवेश भविष्य के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ये बात बनकोट गांव पर बिलकुल सटीक बैठती है। बुजुर्ग बताते हैं कि पहले से ही ग्रामीणों में पढ़ाई को लेकर लगन थी। वह खुद प्राथमिक के बाद आगे की पढ़ाई के लिए पैदल आठ किमी दूर कांडा जाते थे। बाद में बनकोट में ही इंटर कॉलेज खुलने से बच्चों की भागदौड़ कम हुई। गांव के कुछ युवाओं का अच्छे पद पर चयन होने पर अन्य लोग भी प्रेरित हुए। अधिकतर लोग जीतोड़ मेहनत के बल पर ऊंचे मुकाम पर पहुंचने में सफल रहे। करीब ढाई हजार की आबादी वाले बनकोट क्षेत्र (बनकोट और पलतोड़ी) निवासियों में से एक व्यक्ति एक एसडीएम, एक सीबीआई कमिश्नर, तीन वैज्ञानिक, 14 सैन्य अधिकारी, 13 डॉक्टर, 37 इंजीनियर, दो उच्च शिक्षाधिकारी, एक उप शिक्षा निदेशक, दो बीईओ, 23 प्रधानाचार्य, दो पायलट, तीन बैंक प्रबंधक, दो लोग रेंजर बन चुके हैं। 10 लोग पुलिस विभाग में कार्यरत हैं, जबकि 75 से अधिक लोग विदेशों में उच्च पदों पर कार्यरत हैं। सात लोग जिला मुख्यालय, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में वकालत कर रहे हैं।
100 से अधिक डिग्री, 150 डिप्लोमा धारी
पढ़ने लिखने की परंपरा को युवाओं ने बखूबी बरकरार रखा है। इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गांव में सौ से अधिक बच्चे बीएड, बीपीएड और एमपीएड डिग्रीधारक हैं। गांव के 150 से ज्यादा लोगों के पास कोई न कोई डिप्लोमा है।
देश सेवा में भी अग्रणी
बनकोटियों ने देश की आजादी में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। गांव से सेेनानी विजय सिंह, उम्मेद सिंह, महेंद्र सिंह का देश की स्वतंत्रता में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। राम सिंह बनकोटी ने वर्ष 1945 में हैदराबाद की लड़ाई में शहादत दी। दीवान सिंह बनकोटी ने वर्ष 1947 भारत पाक युद्ध, जीत सिंह बनकोटी, केदार सिंह बनकोटी, महेंद्र सिंह बनकोटी वर्ष 1962 भारत-चीन युद्ध में शहीद हुए। अदम्य साहस एवं वीरता के लिए हवलदार प्रताप सिंह बनकोटी को भारत सरकार ने वर्ष 1948 में वीर चक्र से नवाजा।
सुविधाओं के अभाव में पलायन
बनकोट के पास उपलब्धियों का ताज तो है लेकिन समस्याओं की सेज के कारण गांव पलायन की चपेट में है। मूलभूत सुविधाओं की कमी या फिर बदहाली ने कई लोगाें को गांव छोड़ने पर मजबूर कर दिया। गांव के कई परिवार बेहतर सुविधाओं की तलाश में हल्द्वानी, देहरादून आदि शहरों में बस गए हैं। हालांकि अभी गांव में एक इंटर कॉलेज, एक कन्या हाईस्कूल, दो प्राथमिक विद्यालय, एक आईटीआई, एक स्वास्थ्य केंद्र और एक ग्रामीण बैंक है।
हमारे गांव के लोग उच्च पदों पर आसीन हैं। आने वाली पीढ़ी भी इन्हीं प्रतिभाओं को देखते हुए आगे बढ़ने के लिए प्रयास कर रही है। - रवींद्र बनकोटी, सामाजिक कार्यकर्ता बनकोट गांव।
पिथौरागढ़ जिले के इस दूरस्थ गांव में इतनी प्रतिभाएं हैं। इस बात से काफी गर्व महसूस होता है। आगे भी इसी तरह गांव के लोग देश-विदेश में नाम कमाते रहें, यही कामना है। - तारा बनकोटी, ग्राम प्रधान बनकोट गांव।