पिथौरागढ़ जिले के आपदा प्रभावितों के जख्मों पर मरहम लगाने में सरकारी तंत्र फेल साबित हुआ है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि पांच साल बाद भी 85 आपदा प्रभावित परिवारों के विस्थापन के लिए जमीन नहीं खोजी जा सकी है।
कई आपदा प्रभावित गांवों में अब तक भूगर्भीय सर्वेक्षण न होने से भी प्रभावितों का विस्थापन अटका है। ऐसे में प्रभावित आपदा के साथ ही सिस्टम की मार सहने के लिए मजबूर हैं। किसी तरह टूटे-फूटे घरों और टेंट में प्रभावितों के दिन बीत रहे हैं। वर्ष 2019 के बाद आई आपदा ने सीमांत जिले के 80 गांवों में तबाही मचाई। तब से आपदा ने 576 परिवारों को गहरे जख्म दिए हैं। भूस्खलन से रहने लायक घर नहीं बचे तो कई प्रभावितों को पड़ोसियों, रिश्तेदारों के यहां तो कई प्रभावितों ने टेंट, स्कूलों में शरण लेनी पड़ी।
आपदा के समय इन सभी प्रभावित परिवारों को विस्थापन की श्रेणी में रखा गया। विस्थापन की फाइल सरकारी कार्यालयों में घूमती रही और बमुश्किल पांच सालों में अब तक 491 प्रभावित परिवारों के जमीन खोजने में सिस्टम के पसीने छूट रहे हैं। ऐसे में प्रभावित अधिकतर प्रभावित टूटे-फूटे घरों में खतरे के बीच रहने के लिए मजबूर हैं तो कई प्रभावितों को कड़ाके की ठंड के बीच टेंट में समय बिताना पड़ रहा है।
भूगर्भीय सर्वेक्षण न होने से विस्थापन अटका
आपदा प्रभावितों के विस्थापन में जमीन के साथ ही प्रभावित गांवों का भूगर्भीय सर्वेक्षण न होना रोढ़ा बना है। पांच साल बाद भी प्रभावित गांवों का भूगर्भीय सर्वेक्षण नहीं किया जा सका है जो विस्थापन के लिए जरूरी है। भूगर्भीय सर्वेक्षण कब होगा और कब विस्थापन के बाद प्रभावितों का जीवन सुरक्षित होगा उन्हें यह चिंता सता रही है।
आपदा प्रभावितों के विस्थान की प्रक्रिया चल रही है। जमीन न मिलने से और प्रभावित गांवों का भूगर्भीय सर्वेक्षण न होने से कुछ प्रभावितों के विस्थापन की प्रक्रिया अटकी है। जल्द सभी औपचारिकता पूरी कर प्रभावितों का विस्थापन किया जाएगा।
-भूपेंद्र महर, जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी, पिथौरागढ़।