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शिव ही अनंत हैं: कुमाऊं में भोलेनाथ के ये नौ मंदिर हैं बेहद खास, हर मनोकामना होती है पूरी; देखें तस्वीरें

Fri, 08 Mar 2024 01:51 PM IST
हीरा मेहरा अमर उजाला नेटवर्क, नैनीताल

सार

पूरे कुमाऊं में शिव का वास है। पिथौरागढ़ जिले में आदि कैलाश है तो बागेश्वर में बागनाथ, अल्मोड़ा में जागेश्वर धाम। शिवरात्रि यानी भगवान भोले शंकर का दिन। शिव आदि हैं...अंत हैं...शिव ही अनंत हैं...समय ही काल है, शिव ही महाकाल हैं।
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जागेश्वर धाम - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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भगवान शंकर, जिन्होंने विश्व कल्याण के लिए कंठ में हला-हल धारण किया और नीलकंठ कहलाए। शिव यानी कल्याणकारी। भगवान शिव देवभूमि के कण-कण में विराजमान हैं। शिवभक्त कहते भी हैं कि जितने कंकर उतने शंकर। कुमाऊं में भोले बाबा का निवास स्थान आदि कैलाश भी है, जहां पार्वती सरोवर में शिव मंदिर में बाबा सपरिवार विराजमान हैं। बाबा का प्रसिद्ध धाम जागेश्वर भी कुमाऊं में है। पुराणों के अनुसार भगवान शिव और सप्तऋषियों ने यहां तपस्या की थी। शिव के इन्हीं प्रसिद्ध धामों को मानस माला प्रोजेक्ट में शामिल किया गया है। आइए आपको इन शिवधामों से परिचित कराते हैं...
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आदि कैलाश
आदि कैलाश 
भगवान शिव के सबसे प्राचीन स्थल आदि कैलाश स्थित पार्वती सरोवर में शिव मंदिर भी है। इस मंदिर का निर्माण सबसे पहले कुटी गांव के लोगों ने वर्ष 1971 में किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 12 अक्तूबर को इस मंदिर में पूजा अर्चना की थी। 14422 फुट की ऊंचाई पर स्थित आदि कैलाश अद्भुत और अलौकिक है। मान्यता है कि जब भगवान शिव माता पार्वती से विवाह करने के लिए जा रहे थे तब इस स्थान पर रुके थे। वर्ष 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे के बाद इस स्थान को अंतर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है।

ऐसे पहुंचें: आदि कैलाश जाने के लिए सड़क मार्ग है। धारचूला से ज्योलिंगकांग की दूरी 112 किलोमीटर है। धारचूला से टैक्सी मिल जाती है लेकिन यहां जाने के लिए इनर लाइन परमिट और शारीरिक रूप से फिट होने का प्रमाण पत्र जरूरी होता है। इस वर्ष सरकार की हल्द्वानी से आदि कैलाश तक हेलीकॉप्टर सेवा शुरू करने की भी योजना है। 
 

बागेश्वर का बागनाथ धाम - फोटो : BAGESHWAR
बागनाथ धाम
बागेश्वर के बागनाथ धाम को कुमाऊं के काशी के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर का इतिहास चंद शासनकाल से तो जुड़ा ही है। मंदिर से त्रेता युग के प्रसंग जुड़े हैं। कुमाऊं की काशी को सरकार ने मानसखंड मंदिर माला योजना में शामिल किया है। बागेश्वर के बागनाथ मंदिर को उत्तर भारत का एकमात्र दक्षिणमुखी प्राचीन शिव मंदिर माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार त्रेता युग में महर्षि वशिष्ठ कैलाश मानसरोवर से सरयू नदी को लेकर आ रहे थे। बागेश्वर में नीलेश्वर और भीलेश्वर पर्वत की तलहटी पर ब्रह्मकपाली के समीप मार्कंडेय ऋषि तपस्या कर रहे थे।

सरयू उक्त स्थान से आगे नहीं बढ़ी। चिंतित वशिष्ठ ऋषि ने भगवान शंकर की आराधना की। भगवान शंकर प्रसन्न हो गए और बाघ के रूप में और मां पार्वती गाय के रूप में धरती पर आईं। बाघ ने जैसे ही गाय पर हमला किया तो गाय रंभाई। गाय के रंभाने की आवाज सुनकर मार्कंडेय ऋषि की तपस्या भंग हो गई। भगवान शंकर और माता पार्वती अपने मूल स्वरूप में आ गए। 

ऐसे पहुंचे: हल्द्वानी के रास्ते बागेश्वर बस से या टैक्सी से जाया जा सकता है। इसके अलावा गढ़वाल की ओर से भी बागेश्वर के बागनाथ मंदिर आने का रास्ता है। ये रास्ता ग्वालदम होते हुए कुमाऊं की सीमा में प्रवेश करते हुए बागेश्वर पहुंचा जा सकता है।
 

जागेश्वर धाम
जागेश्वर धाम
उत्तराखंड का पांचवां धाम :जागेश्वर धाम को उत्तराखंड के पांचवें धाम के रूप में जाना जाता है। बाबा जागनाथ का आशीर्वाद लेने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी यहां आ चुके हैं, जिसके बाद यहां आने वाले पर्यटकों की संख्या में और वृद्धि हुई। पुराणों के अनुसार यह प्रथम मंदिर है जहां लिंग के रूप में शिवपूजन की परंपरा शुरू हुई। सावन और शिवरात्रि को यहां भक्तों की खासी भीड़ उमड़ती है। यहां स्थित ज्योतिर्लिंग को आठवां ज्योतिर्लिंग माना जाता है। इस धाम और दारुक वन का उल्लेख स्कंद पुराण, शिव पुराण और लिंग पुराण में भी है। जागेश्वर धाम में 125 मंदिरों का समूह है। मान्यता है कि भगवान राम के पुत्र लव और कुश ने यहां यज्ञ आयोजित कर देवी-देवताओं को आमंत्रित किया था। माना जाता है कि उन्होंने ही इन मंदिरों की स्थापना की थी।

ऐसे पहुंचें: मैदानी क्षेत्र टनकपुर और हल्द्वानी तक रेल और फिर यहां से जागेश्वर पहुंचने के लिए के लिए सिर्फ टैक्सी, केमू और रोडवेज बस साधन है। हल्द्वानी से यहां पहुंचने के लिए पहले अल्मोड़ा नगर पहुंचना होगा, जबकि टकनपुर से घाट, पनार, दन्या होते हुए आरतोला पहुंचना होगा। यहां से तीन किमी दूर स्थित इस धाम तक जोड़ने के लिए अलग सड़क में आवाजाही करनी होगी। वहीं पिथौरागढ़ से यहां पहुंचने के लिए पनार-अल्मोड़ा या बेरीनाग-शेराघाट हाइवे का सहारा लिया जा सकता है।
 

पाताल भुवनेश्वर गुफा - फोटो : अमर उजाला
पाताल भुवनेश्वर -शिव समेत 33 कोटि देवी-देवताओं का इस गुफा में है वास 
उत्तराखंड में कई ऐसी गुफाएं हैं, जो लोगों के लिए आज भी हैरानी का विषय बनी हुई हैं। इन्हीं में पिथौरागढ़ जिले की पाताल भुवनेश्वर गुफा भी शामिल है। इस गुफा का जिक्र पुराणों में भी है। पाताल भुवनेश्वर गुफा समुद्र तल से करीब 90 फीट गहरी है। यह गुफा प्रवेश द्वार से 160 मीटर लंबी है। कहा जाता है कि इस मंदिर में 33 कोटि देवी-देवताओं का वास है। इस गुफा की ओर जाती हुई पतली सुरंग में अनेक चट्टानों के साथ ही विभिन्न भगवानों की जटिल छवियां बनी हैं। यहां पर नागों के राजा अधिशेष की कलाकृतियां भी देखने को मिलती हैं। इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि सूर्य वंश के राजा और त्रेता युग में अयोध्या पर शासन करने वाले राजा ऋतुपर्णा ने इस गुफा की खोज की थी। उन्हें यहां नागों के राजा अधिशेष मिले थे। पौराणिक कथाओं के अनुसार, कलियुग में मंदिर की खोज जगदगुरु आदि शंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी में की थी, जहां उन्होंने यहां तांबे का शिवलिंग स्थापित किया था।

कैसे पहुंचें: यह स्थान सड़क मार्ग से जुड़ा है। यहां पहुंचने के लिए अंतिम रेलवे स्टेशन टनकपुर है। टैक्सी और बसें भी आसानी से उपलब्ध हैं। हवाई अड्डा पंतनगर है, जो पाताल भुवनेश्वर से 224 किमी दूर है। इसके अलावा पिथौरागढ़ से 96 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस गुफा के दर्शन के लिए गंगोलीहाट होते हुए टैक्सी या बस से भी जाया जा सकता है।
 

पाताल रुद्रेश्वर - फोटो : अमर उजाला
पाताल रुद्रेश्वर -30 साल पहले खोजी गई थी गुफा
चंपावत जिले के वारसी गांव में पाताल रुद्रेश्वर गुफा का पता 30 साल पहले 1993 में चला था। जब एक स्थानीय युवक को स्वप्न में मिले आदेश के बाद उसने गुफा की खोज की और उसकी जानकारी अन्य ग्रामीणों को दी। इसके बाद गुफा मंदिर की ख्याति दिनोंदिन फैलती गई। मानसखंड माला मिशन में शामिल पाताल रुद्रेश्वर मंदिर और सरोवर गुफा के कायाकल्प के लिए शासन की ओर से 2.20 करोड़ की धनराशि अवमुक्त की गई है। 
 

सिद्देश्वर
नीलियम कालोनी में 1990 के आसपास कालोनी काटी जा रही थी लेकिन प्लाट नहीं बिक रहे थे। तब दिल्ली निवासी एक प्लाट स्वामी हल्द्वानी पहुंचे और दंडी स्वामी शंकरानंद महाराज के पास। महाराज ने तब कहा कि कालोनी बना रहे हो लोग पूजा कहां करेंगे। उन्होंने मंदिर बनवाने के लिए कहा। 19 सितंबर 1994 को मंदिर का काम शुरु हुआ। मंदिर के सेवक धनंजय महाराज बताते हैं कि तकरीबन 10 साल में मंदिर का काम पूरा हुआ और 23 नवंबर 2004 में मंदिर भक्तों के लिए खुल गया। 1971 में नान्तिन महाराज के एक भक्त को बाबा ने हकीकत में मंदिर के दर्शन करा दिए थे। मंदिर निर्माण के बाद भक्त यहां आए तो अचरज में रह गए उन्होंने बताया कि इस मंदिर के दर्शन बाबा ने सपने में 30 वर्ष पहले ही करा दिए थे।

कैसे पहुंचे: सड़क मार्ग से जुड़ा है। यहां पहुंचने के लिए हल्द्वानी से ऑटो या टेक्सी से सिद्देश्वर मंदिर पहुंचा जा सकता है। 
 

बेलबाबा मंदिर - फोटो : अमर उजाला
बेलबाबा मंदिर
रामपुर रोड स्थित फुटकुंआ में प्रसिद्ध बेलबाबा मंदिर की भी कहानी है। कहा जाता है कि 1890 के आसपास जब रामपुर रोड का भी अस्तित्व नहीं था। तब इस क्षेत्र में घूमते-घूमते एक संत पहुंचे और बेल के पेड़ के नीचे उन्होंने तपस्या शुरू कर दी। उस समय लंबे समय से बारिश नहीं होने से अकाल की स्थिति बनी हुई थी। वरिष्ठ नागरिक और बेलबाबा मंदिर के सेवादारों के अनुसार लोगों ने संत से बारिश कराने और संकट से उबारने की प्रार्थना की। उसी रात अचानक तेज बारिश हुई 24 घंटे तक लगातार जारी रही। दूसरे दिन सुबह जब लोग संत को देखने पहुंचे तो तब तक संत उसी पेड़ के नीचे समाधिस्थ हो चुके थे। धीरे-धीरे आस्था बढ़ने लगी और बाद में यहां शिव और देवी मंदिर का निर्माण शुरू हुआ। संत के दिव्य चमत्कार सुनने के बाद यहां नान्तिन महाराज और दंडीश्वर शंकर गिरी महाराज भी आए। दंडीश्वर महाराज ने यहां शंकर और देवी मंदिर की स्थापना करवाई।

कैसे पहुंचे: सड़क मार्ग से जुड़ा है। यहां पहुंचने के लिए हल्द्वानी या रुद्रपुर से ऑटो या टेक्सी से बेलबाबा पहुंचा जा सकता है। 
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बालेश्वर मंदिर
बानर राज बाली ने की थी तपस्या : थल में रामगंगा नदी किनारे स्थित बालेश्वर मंदिर का विशेष महत्व है। शिवरात्रि, माघ पूर्णिमा सहित विभिन्न अवसरों पर इस मंदिर में विशाल मेलों का आयोजन होता है। श्री 1008 बालेश्वर महादेव का मंदिर रामगंगा नदी के पवित्र संगम के पूरब में स्थित है। कहा जाता है कि त्रेता युग में इसी तट पर बानर राजा बाली ने 20 साल तक एक पैर पर खड़े होकर कठोर तप किया था। भगवान शिव इससे प्रसन्न हुए और बाली को बाल रूप में दर्शन देकर शिवलिंग में समाहित हो गए। स्वयंभू शिवलिंग की ख्याति से ही यह बालतीर्थ बालेश्वर कहलाया। इसे बालेश्वर या बालीश्वर कहा जाता है। बालेश्वर मंदिर की स्थापना सातवीं सदी में कत्यूरी राजा के शासन काल में बलतिर गांव के सेरे में हुई थी।

कैसे पहुंचे: सड़क मार्ग से जुड़ा है। यहां पहुंचने के लिए थल से टेक्सी से बालेश्वर मंदिर पहुंचा जा सकता है। 
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