हर किसी को जीवन में उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ता है जो लोग स्वाभिमान और संघर्ष को जीवन का ध्येय बना लेते हैं वे हर चुनौती का डटकर सामना करते हैं और समाज के लिए सीख छोड़ जाते हैं।
ब्रिटिश शासनकाल में सीमांत जिले पिथौरागढ़ के माइग्रेशन विलेज नौलरा में पैदा हुई तुलसी देवी ऐसी ही सख्सियत रही जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों को मात देकर न सिर्फ उद्यमशीलता की मिसाल पेश की बल्कि बेसहारा महिलाओं को स्वावलंबी बनाकर उनका जीवन भी संवारा।
1917 में भोटिया व्यापारी खीम सिंह रावत और सरस्वती रावत के घर में जन्मी तुलसी देवी का बचपन गरीबी में गुजरा। पांच साल की उम्र में पिता और छोटे भाई के गुजरने के बाद घर पर मां-बेटी एक दूसरे के सहारे जीने लगीं। तुलसी की प्राथमिक शिक्षा गांव के स्कूल में हुई। अभाव के चलते तुलसी आगे की शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकीं।
1943 में उनका विवाह प्रतिष्ठित व्यापारी परिवार के दीवान सिंह राणा से हुआ। जल्द ही उन्हें वैधव्य की मार झेलनी पड़ी। परिवार वालों ने परंपरा के अनुसार देवर से विवाह करना चाहा लेकिन तुलसी ने इसका विरोध किया। संपन्न जीवन त्याग कर वह मां के पास लौट आई और अपने पुश्तैनी ऊनी कारोबार में जुट गईं। उनके एक चचेरे भाई ने अपने चाय बागान की कुछ भूमि इनके नाम कर दी। यहां उन्होंने स्थायी घर बनाया और आजाविका का प्रबंध किया।
1946 में कौसानी में महात्मा गांधी की शिष्या सरला बहन ने महिलाओं के लिए लक्ष्मी आश्रम संस्था की स्थापना की। तुलसी देवी सरला बहन के सम्पर्क में आई। जुझारु तुलसी देवी ने आश्रम से प्रेरणा लेकर 1952 में अपनी भूमि पर कताई-बुनाई केंद्र की स्थापना की। 1957 में ऊन गृह उद्योग समिति के नाम से उसे पंजीकृत करवाया।
तुलसी देवी ने बेसहारों को बनाया स्वावलंबी
तुलसी देवी ने असहाय और बेसहारा स्त्रियों को ऊन उद्योग का प्रशिक्षण देकर स्वावलंबी बनाया और बिखरते परिवारों को सहारा दिया। उन्होंने कई अनाथ बालिकाओं का पालन-पोषण किया और शिक्षा-दीक्षा देकर उनका घर बसाया। उन्होंने बालकों को भी प्रशिक्षित कर स्वावलंबी बनाया। 1972 में तुलसी देवी जिला कांग्रेस कमेटी की महिला संयोजिका बनीं और 1974 में जिला परिषद चमोली की अध्यक्ष रहीं।
1977 में उत्तरप्रदेश राज्य समाज कल्याण सलाहकार बोर्ड की ओर से सीमांत कल्याण विस्तार परियोजना ग्वालदम की अध्यक्ष मनोनीत हुईं। 1978 में इन्होंने अपनी संस्था में एक कंडेंस्ड कोर्स चलाया जिसमें अर्धशिक्षित महिलाओं और लड़कियों को प्रशिक्षण दिया।
उत्तराखंड के सरोकारों से जुड़े लेखक जगमोहन रौतेला ने बताया कि तुलसी देवी ने 1980 में ट्राइसेम योजना के अंतर्गत प्रशिक्षण देना शुरू किया। बालवाड़ी कार्यक्रम भी चलाए और हाड़ा योजना के अंतर्गत लोगों को ऋण दिलवाकर स्वावलंबी बनाया। 1976 में उन्होंने एक नए प्रकार के शॉल का नाम तुलसी रानी शॉल दिया।
ऑस्ट्रेलियन ऊन में प्रयोग असफल होने पर उन्होंने अंगोरा ऊन से शॉल बनाया। 1983 में इस शॉल के निर्माण के लिए उन्होंने तुलसी रानी शॉल फैक्ट्री बनाई। उन्हें एक संघर्षशील, स्वाबलंबी, उदार, जुझारु समाजसेविका के रूप में आज भी याद किया जाता है।
रोओ नहीं आगे बढ़ो। यदि शिक्षित नहीं हो तो अपने हाथों व दिमाग का उपयोग करो।
हारो नहीं, भगवान ने तुम्हें शक्ति दी है, उसको बढ़ाओ, अपने पैरों पर खड़ी हो जाओ।
तुलसी देवी