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गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने रामगढ़ में रोपित किया था मेडिसिनल प्लांट गिंगो बाईलोवा

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कैलाश पाठक
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हल्द्वानी। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर साहित्यकार, कवि के साथ ही प्रकृति प्रेमी और पर्यावरण के प्रति समर्पित व्यक्ति भी थे। टैगोर टॉप, रामगढ़ में प्रवास के दौरान उन्होंने ‘गिंगो बाईलोवा’ नामक पौधा रोपा था जो वर्तमान में यौवनावस्था में पहुंच चुका है। वनस्पति विज्ञानियों के मुताबिक यह एक मेडिसनल प्लांट है। वर्तमान में इससे निर्मित गिंगो वीटा कैप्सूल बाजार में आ चुके हैं। यह शक्तिवर्धक दवा है।
शांति निकेतन ट्रस्ट फॉर हिमालया के सचिव प्रो. अतुल जोशी बताते हैं कि गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने रामगढ़ प्रवास के दौरान न केवल कालजयी ग्रंथ गीतांजलि की रचना की बल्कि विश्व में विलुप्त प्राय: पादप प्रजाति गिंगो बाईलोवा का रोपण कर पर्यावरण संरक्षण के प्रति समर्पण को भी साकार किया। माना जाता है कि गुरुदेव इस वृक्ष की पौध को अपनी विदेश यात्रा से यहां लाए थे। रामगढ़ और कुमाऊं के वन क्षेत्रों में ‘गिंगो बाईलोवा’ नामक वृक्ष की प्रजाति नहीं पाई जाती है। पर्यावरणविद् और वनस्पति विज्ञानी डॉ. एसडी तिवारी बताते हैं कि गुरुदेव ने रामगढ़ के ‘शीशमहल’ स्थित अपने आवास के पास एक ‘अनावृत जीवी’ कुल के पौधे का रोपण किया था। यह एतिहासिक वृक्ष आज भी विद्यमान है, जिसकी आयु करीब 116 वर्ष से भी अधिक प्रतीत होती है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह एक जीवित जीवाश्म का उदाहरण है।
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वर्ष 2017 में अपनी रामगढ़ यात्रा पर आए डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ इस वृक्ष की आयु और महत्व का अध्ययन करने के लिए उसकी पत्तियों एवं शाखाओं को वन अनुसंधान केंद्र, देहरादून भी ले गए थे। इस वृक्ष का रामगढ़ में होना मात्र संयोग न होकर प्रकृति प्रेमी गुरुदेव की उपस्थिति का एक और ठोस प्रमाण है। रामगढ़ के अतिरिक्त दुर्लभ गिंगो बाईलोवा का एक-एक वृक्ष डीएसबी परिसर नैनीताल और राजभवन नैनीताल में भी है। इस वृक्ष के उत्पाद के रूप में बनने वाली शक्तिवर्धक दवाइयों की देश विदेश के बाजारों में अत्यधिक मांग है। जबसे विश्वभारती विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल ने रामगढ़ में अपने नवीन परिसर की स्थापना करने का निर्णय लिया है तबसे ही रामगढ़ आने वाले पर्यटकों एवं प्रकृति प्रेमियों के लिए टैगोर टॉप के साथ ही वहां स्थित गिंगो बाईलोवा वृक्ष भी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
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गिंगो बाईलोवा का वट, पीपल की तरह है आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व
इस वृक्ष का चीन एवं जापान जैसे बौद्ध धर्म के अनुयायी देशों में वहीं आध्यात्मिक एवं धार्मिक महत्व है जो हिंदू धर्म में वट एवं पीपल का है। यही नहीं इस वृक्ष का चिकित्सकीय एवं आयुर्वेद के दृष्टिकोण से भी अत्यधिक महत्व है।
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