हल्द्वानी। मेडिकल कॉलेजों में सहायक अध्यापक बनने लिए प्रदेश सरकार की ओर से निर्धारित 30 वर्ष की आयु सीमा बाधक बन रही है। इस नियम से एमबीबीएस किए नए डॉक्टर खुद को फार्म भरने में अयोग्य पा रहे हैं। युवा डॉक्टरों ने आयु सीमा समाप्त करने के लिए पत्र भेजकर प्रधानमंत्री से न्याय की गुहार लगाई है।
युवा डॉक्टरों का कहना है कि उत्तराखंड राज्य चिकित्सा शिक्षा विभाग के अंतर्गत राजकीय मेडिकल कॉलेजों में सहायक अध्यापक पदों पर नियुक्ति के लिए 25 मार्च 22 को एक विज्ञापन प्रकाशित कराया गया था। इसमें एक जुलाई 2021 को न्यूनतम आयु सीमा 30 वर्ष निर्धारित की गई है, लेकिन मेडिकल कॉलेज में संविदा पर कार्यरत चिकित्सक न्यूनतम आयु के लिए खुद को योग्य नहीं पा रहे हैं। काफी संख्या में युवा डॉक्टर आयु सीमा की बाध्यता के चलते फार्म नहीं भर सके। भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) जैसे संस्थानों में न्यूनतम आयु सीमा की बाध्यता नहीं है। वर्तमान में प्रदेश के मेडिकल कालेजों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी भी है। यदि आयु सीमा की बाध्यता हटा ली जाए तो काफी संख्या में सीनियर रेजीडेंट की अवधि पूरा कर चुके डॉक्टर आवेदन कर सकते हैं। प्रदेश में एमबीबीएस में प्रवेश की न्यूनतम आयु 17 वर्ष है। प्रवेश लेने के बाद छात्र साढ़े चार सालों में एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी कर लेते हैं। छात्र एक साल इंटर्नशिप और तीन साल में स्नातकोत्तर प्रशिक्षण (एमडी) पूरा करते हैं। इस प्रकार 25 या 26 वर्ष में एमबीबीएस एमडी युवक तैयार हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में न्यूनतम अवधि 30 वर्ष निर्धारित करना उचित नहीं है। प्रधानमंत्री को पत्र भेजने वालों में डॉ. साहिल खुराना, डॉ. अभिनव बिष्ट, डॉ. पूजा हटवाल, डॉ. कौशल पांडे, डॉ. अभिनव मनीष का नाम शामिल है। पत्र की प्रति प्रदेश के राज्यपाल और मुख्यमंत्री को भी भेजी गई है।