सहस्त्रधारा मार्ग स्थित नगर निगम की सत्तर बीघा जमीन पर कब्जे का मामला एसआईटी के हवाले कर दिया गया है। एसआईटी इस प्रकरण की गहन जांच कर शासन को सौंपेगी। विशेषज्ञों की मानें तो नगर निगम की यह भूमि साठ से सत्तर करोड़ रुपये की कीमत की है।
इस बेशकीमती भूमि पर पिछले बारह-तेरह साल से सफेदपोश माफियाओं की नजर रही। धीरे-धीरे यहां पर लोग काबिज होते गए। हालांकि नगर निगम प्रशासन की तरफ से कई बार बड़े अभियान भी चलाए गए। लेकिन कब्जे हटने या कम होने के बजाय बढ़ते ही गए।
केष्टवाल ने चलाया जमकर अभियान
नगर निगम के पूर्व प्रशासक एसएस संधू, हाल ही तक एमएनए रहे हरक सिंह रावत ने भी कई बार अभियान चलवाए। अवकाशप्राप्त भूमि अधीक्षक दर्शन सिंह केष्टवाल ने भी जमकर अभियान चलाए लेकिन परिणाम सिफर रहे।
शर्मनाक यह रहा कि सरकारों ने ईमानदार अधिकारियों, कार्मिकों का उत्पीड़न ही किया। यह भी समझ से परे है कि नगर निगम की बेशकीमती भूमि पर कब्जे के लिए किसी भी स्तर पर जवाबदेही तय नहीं हुई।
मेयर विनोद चमोली का कहना है कि ब्रह्मवाला खाले में कब्जे की शुरुआत वर्ष 2003-4 से ही हो गई थी। पूर्ववर्ती सरकारों ने इस ओर उदासीनता का रुख रखा व कब्जों को प्रश्रय देने का काम ही किया।
मेयर ने दी अपनी सफाई
मेयर विनोद चमोली का कहना है कि जब से वह मेयर हैं तब से कई बार कब्जों को हटाने का अभियान चलाया जा चुका है। ऐसा नहीं है कि इसमें सिर्फ गरीब या कमजोर वर्ग के लोग काबिज हैं। तमाम ताकतवर लोग भी यहां पर कब्जा जमाए हैं।
इन्होंने बाकायदा यहां रियल इस्टेट बिजनेसमैन की तरह पूंजी निवेश कर रखा है। वह कहते हैं कि कई बार हमारी टीम पर हमले किए गए। गंभीर हमले तक किए गए। मैंने ही इस मामले को एसआईटी में भेजने का प्रस्ताव किया था। ध्यान देने वाली बात यह है कि अब तक 14 बार बड़े अभियान चल चुके हैं। यहां छह सौ के आसपास कब्जे हैं।
भेजा गया संपत्तिवान बनाने का प्रस्ताव
नगर निगम की तरफ से शासन को प्रस्ताव भेजा गया था कि अगर इन कब्जाधारकों को हटाया नहीं जा सकता तो कम से कम ये सर्किल रेट पर नगर निगम को धनराशि दें।
इससे इनको मालिकाना हक मिल सकता है। शासन से इसकी अनुमति नहीं मिली। मलिन बस्तियों का विनियमितीकरण होने पर ब्रह्मवाला खाला भी नियमित हो जाएगा। इसकी सिफारिश मलिन बस्ती नियमितीकरण समिति भी कर चुकी है।
ब्रह्मवाला खाले कब्जे का मामला
ब्रह्मवाला खाला सहस्त्रधारा मार्ग मयूर विहार के आसपास है। यहां नगर निगम की 70 बीघा भूमि पर धीरे-धीरे कब्जा कर लिया गया। इसमें तमाम ताकतवर व प्रभावशाली लोगों पर आरोप लगे। साफ तौर पर कब्जे की कार्यवाही में राजनीतिक नेताओं की अहम भूमिका रही। ये नेता व जनप्रतिनिधि सभी राजनीतिक दलों के थे।
हालांकि नगर निगम ने अलग-अलग समय बड़े अभियान चलाए लेकिन इसके सार्थक परिणाम सामने नहीं आए। कई बार निर्माण भी तोड़े गए लेकिन फिर दोबारा काम शुरू हो गया।