फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

CM की कुर्सी जाते ही पोल खुलने के डर से 'सफेदपोश' बेचैन

Mon, 28 Mar 2016 11:30 AM IST
मनीष चंद्र भट्ट/ अमर उजाला, देहरादून
विज्ञापन
scam - फोटो : File
विज्ञापन
उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन से अफसरशाही का मिजाज भी बदलेगा। सीधे राजभवन से संचालित होने से अब अफसरशाही को नेताओं के दरबार में हाजरी से मुक्ति मिलेगी।
विज्ञापन


बदले संवैधानिक परिदृश्य में अब कुछ अफसर खुलकर बैटिंग करने के मूड में नजर आ रहे हैं। देहरादून में जमीनों के अवैध कारोबार पर अब तक अफसरशाही सियासी दबाव में दिखी है, जिस पर अब कार्रवाई होने की उम्मीद लगाई जा सकती है। गाहे बगाहे शासन प्रशासन पर बनने वाला दबाव अब हटेगा। वहीं इस बदलाव से सियासी आकाओं के सहारे अपने धंधे चलाने वाले सफेदपोशों में बेचैनी बढ़ी है।

दरअसल, राष्ट्रपति शासन लगते ही प्रदेश में राज्यपाल की ओर से एडवाइजरी बोर्ड का गठन किया जाता है। यह बोर्ड कैबिनेट की तरह काम करता है। इसके तहत अब कमिश्नर, डीएम, एसएसपी समेत तमाम विभागों के प्रमुख चाहें तो अपने प्रशासनिक अधिकारों का स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से इस्तेमाल कर सकते हैं।
विज्ञापन


कुछ अफसरों ने बातचीत में बताया कि सड़क निर्माण, पेयजल, यातायात व्यवस्था, अतिक्रमण और अवैध कब्जे हटाने जैसे हर छोटे बड़े कार्यों में मंत्री, सांसद, विधायक और अन्य जनप्रतिनिधियों का दबाव झेलना पड़ता है। इसमें वह पब्लिक और प्रशासन के नफा नुकसान का भी ख्याल नहीं रखते है।

जानकारों का कहना है कि अफसरों को ऐसे समय में प्रदेश में प्रचलित तमाम जमीन घोटालों, खनन के अवैध धंधों और रियल स्टेट के घपलों आदि की फाइलें उघाड़ कर जनता के हित में सही निर्णय देना चाहिए। राजधानी दून की बात करें तो फ्लाई ओवर निर्माण में देरी, बदहाल यातायात व्यवस्था, सरकारी राशन की कालाबाजारी, फारेस्ट और राजस्व जमीन पर कब्जे, अतिक्रमण, रसूखदारों के खिलाफ पुलिस में दर्ज मुकदमे, शराब के कारोबार में माफियागिरी जैसे मामलों में निष्पक्ष जांच कर असली गुनहगारों पर शिकंजा कसा जा सकता है।

भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी एसएस पांगती का कहना है कि कमिश्नर, डीएम और अन्य अफसरों को विभिन्न अधिनियमों के तहत तमाम अधिकार प्राप्त हैं। सत्ता और जनप्रतिनिधियों के दबाव में वह कई बार जनहित में इसका इस्तेमाल नहीं कर पाते। राष्ट्रपति शासन के दौरान जनता के हित में इनका इस्तेमाल किया जा सकता है।
विज्ञापन

सीएम की कुर्सी जाते ही अधिकारियों का वजूद समाप्त

हरीश रावत
अरविंद सिंह / अमर उजाला, देहरादून

उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लागू होने और मुख्यमंत्री हरीश रावत की कुर्सी जाते ही दर्जनों अधिकारियों की भी कुर्सी चली गई है। कुर्सी गवाने वालों में तमाम ऐसे अफसर और राजनीतिक हस्तियां शामिल हैं जो सचिवालय प्रशासन की ओर से -टर्मिनस के आधार मुख्यमंत्री के साथ न सिर्फ संबद्ध थे, बल्कि उनके इशारों पर तमाम छोटे-बड़े फैसले भी लिए जाते थे।

कुर्सी गंवाने वाले इन को-टर्मिनस अफसरों में मुख्यमंत्री का मीडिया मैनेजमेंट संभालने वाले सिपहसालारों के अलावा एक दर्जन से अधिक विशेष कार्याधिकारी शामिल है।

सरकार जाते ही जिन लोगों को कुर्सी गंवानी पड़ी है उसमें मुख्यमंत्री के औद्योगिक सलाहकार रणजीत सिंह रावत, आर्थिक सलाहकार इंदु कुमार पांडे, सलाहकार डॉ. संजय चौधरी, मीडिया मैनेजमेंट प्रभारी सुरेंद्र कुमार अग्रवाल, मीडिया कोआर्डिनेटर राजीव जैन, सोशल मीडिया प्रभारी हरपाल रावत, सोशल मीडिया उप समन्वयक ओम प्रकाश सती, जनसंपर्क समन्वयक जसबीर सिंह रावत, पीआरओ नृपेंद्र तिवारी, वरिष्ठ निजी सचिवगण शंकर रावत, कमल रावत और रंजीत दास शामिल है।

इसके अलावा दर्जन भर विशेष कार्याधिकारियों को भी अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी है। जिन अफसरों को कुर्सी गई है उसमें चंदन सिंह घुुगत्याल (प्रथम), चंदन सिंह जीना, विनोद चंद्र रावत, आनंद बहुगुणा, डॉ. मनोज शर्मा, रियाज नाजमी, अरुणा कुमार, दिनेश सिंह भंडारी, सैय्यद मोहम्मद कासिम, नवीन सिंह तड़ागी, ललित मोहन आर्य, संजीव कुमार शर्मा, शैलेश कुमार पंत, रवींद्र कुमार चौहान और धर्मेंद्र नयाल शामिल है।

उल्लेखनीय पहलू यह है कि कुर्सी गंवाने वाले अफसरों में तमाम ऐसे हैं जिन्हें मुख्यमंत्री ने अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए न सिर्फ उन्हें ऐसे पदों पर बिठाया बल्कि इन लोगों की तमाम छोटे बड़े सरकारी फैसलों में भी इनकी अहम भूमिका रही।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें