उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन से अफसरशाही का मिजाज भी बदलेगा। सीधे राजभवन से संचालित होने से अब अफसरशाही को नेताओं के दरबार में हाजरी से मुक्ति मिलेगी।
बदले संवैधानिक परिदृश्य में अब कुछ अफसर खुलकर बैटिंग करने के मूड में नजर आ रहे हैं। देहरादून में जमीनों के अवैध कारोबार पर अब तक अफसरशाही सियासी दबाव में दिखी है, जिस पर अब कार्रवाई होने की उम्मीद लगाई जा सकती है। गाहे बगाहे शासन प्रशासन पर बनने वाला दबाव अब हटेगा। वहीं इस बदलाव से सियासी आकाओं के सहारे अपने धंधे चलाने वाले सफेदपोशों में बेचैनी बढ़ी है।
दरअसल, राष्ट्रपति शासन लगते ही प्रदेश में राज्यपाल की ओर से एडवाइजरी बोर्ड का गठन किया जाता है। यह बोर्ड कैबिनेट की तरह काम करता है। इसके तहत अब कमिश्नर, डीएम, एसएसपी समेत तमाम विभागों के प्रमुख चाहें तो अपने प्रशासनिक अधिकारों का स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से इस्तेमाल कर सकते हैं।
कुछ अफसरों ने बातचीत में बताया कि सड़क निर्माण, पेयजल, यातायात व्यवस्था, अतिक्रमण और अवैध कब्जे हटाने जैसे हर छोटे बड़े कार्यों में मंत्री, सांसद, विधायक और अन्य जनप्रतिनिधियों का दबाव झेलना पड़ता है। इसमें वह पब्लिक और प्रशासन के नफा नुकसान का भी ख्याल नहीं रखते है।
जानकारों का कहना है कि अफसरों को ऐसे समय में प्रदेश में प्रचलित तमाम जमीन घोटालों, खनन के अवैध धंधों और रियल स्टेट के घपलों आदि की फाइलें उघाड़ कर जनता के हित में सही निर्णय देना चाहिए। राजधानी दून की बात करें तो फ्लाई ओवर निर्माण में देरी, बदहाल यातायात व्यवस्था, सरकारी राशन की कालाबाजारी, फारेस्ट और राजस्व जमीन पर कब्जे, अतिक्रमण, रसूखदारों के खिलाफ पुलिस में दर्ज मुकदमे, शराब के कारोबार में माफियागिरी जैसे मामलों में निष्पक्ष जांच कर असली गुनहगारों पर शिकंजा कसा जा सकता है।
भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी एसएस पांगती का कहना है कि कमिश्नर, डीएम और अन्य अफसरों को विभिन्न अधिनियमों के तहत तमाम अधिकार प्राप्त हैं। सत्ता और जनप्रतिनिधियों के दबाव में वह कई बार जनहित में इसका इस्तेमाल नहीं कर पाते। राष्ट्रपति शासन के दौरान जनता के हित में इनका इस्तेमाल किया जा सकता है।