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साइबर क्राइम: बंगाल से बिहार तक जाल, विवेचना का अकाल

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साइबर ठगों का जाल बंगाल से बिहार तक फैला है। हजारों किमी दूर बैठे इन अपराधियों तक पहुंचना पुलिस के लिए बेहद मुश्किल होता है। साइबर क्राइम की विवेचना के अकाल का यही कारण है। दरअसल आरोपियों के हजारों किमी दूर होने की वजह से विवेचना तय समय तक नहीं हो पाती है। मोबाइल सिम में लेने के बदले दी गई फर्जी आईडी और लोकेशन में पुलिस उलझ जाती है। कई थानों में विवेचना एक साल से अटकी पड़ी हैं।
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साइबर ठग तरह-तरह के हथकंडे अपनाकर लोगों को शिकार बना रहे हैं। पुलिस लगातार लोगों को जागरूक भी करती है, बावजूद लोग लालच में फंसकर ठगों का शिकार हो जाते हैं। साइबर ठगी करने वाले अधिकतर आरोपी बिहार, झारखंड के नक्सल प्रभावित इलाके, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और गुजरात में बैठकर खातों में सेंधमारी करते हैं। लोकेशन मिलने पर वहां दबिश देना मुश्किल होता है। पुलिस को वहां तक पहुंचने में कई व्यावहारिक दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं। आरोपी अपने ठिकाने बदलते रहते हैं।
इन तमाम वजहों से विवेचनाएं लटक जाती हैं। पुलिस सूत्रों के मुताबिक बिहार में बैठकर ठगी करने वाले आरोपी पश्चिम बंगाल की आईडी के सिम का इस्तेमाल करते हैं। जबकि पश्चिम बंगाल के आरोपी दूसरे स्टेट की आईडी के सिम का प्रयोग करते हैं। राजस्थान के मेवात में असम के सिम चलाते हैं। आईडी और लोकेशन में भी पुलिस उलझ जाती है। दवाब बढ़ने पर सिम भी बदल दिया जाता है। संवाद
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लग जाती है मूवमेंट की भनक
साइबर क्रिमिनलों का मुखबिर सिस्टम पुलिस से मजबूत होता है। बिहार, झारखंड और दूसरी जगहों से कई बार पुलिस को खाली हाथ लौटना पड़ता है। मेवात में तो पहाड़ का सहारा लेकर ही साइबर ठग पुलिस को चक्कर कटा देते हैं।
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जिले में यह है स्थिति
साइबर सेल टीम ने ठगी के शिकार लोगों को एक जनवरी से अब तक 21 लाख 70 हजार रुपये वापस लौटाए हैं। कुल 407 प्रकरण जिले में साइबर क्राइम के चल रहे हैं। कई मामलों की जांच लटकी है। कई में थाने में मुकदमा भी दर्ज कराया गया है।
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लोगों को लगातार जागरूक किया जाता है। साइबर ठगी के मुकदमों के लिए गठित साइबर सेल लगातार कार्रवाई भी कर रही है। लोगों से अपील है कि साइबर ठगों के झांसे में न आए।
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- सेंथिल अवूदई कृष्णराज एस, एसएसपी हरिद्वार
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