इंसानों की सबसे करीबी दोस्त गौरेया आबादी के शोरगुल में कहीं खो गई है। घर-आंगन में अब कौवे भी नजर नहीं आते हैं। खेत-खलिहान की जगह कंकरीट के जंगल खड़े होने और जंगल में इंसानों के दखल से पक्षियों की कई प्रजातियों ने अपना बसेरा ही बदल लिया है। जलवायु परिवर्तन का भी असर प्रवासी पक्षियों पर भी पड़ा है। प्रवासी पक्षियों के प्रवास की अवधि करीब एक महीने कम हो गई है। बावजूद इसके उत्तराखंड आज भी पक्षियों का घर है। देश में 1303 प्रजाति के पक्षियों में से 693 प्रजातियां उत्तराखंड के अलग-अलग इलाकों में वास करती हैं।
गुरुकुल कांगड़ी विवि के एमेरिटस प्रोफेसर एवं पक्षी विशेषज्ञ डॉ. दिनेश कुमार भट्ट बताते हैं कि विश्व भर में पक्षियों पर संकट मंडरा रहा है। अफगानिस्तान में लगातार कई वर्ष युद्ध चलने से साइबेरियन क्रेन विलुप्त हो गए हैं। साइबेरिया से भारत एवं एशिया के देशों में आने के लिए साइबेरियन क्रेन के अफगानिस्तान का यही रास्ता था। भारत में गिद्ध इस श्रेणी में हैं। प्रो. भट्ट ने बताया कि उत्तराखंड में पक्षियों की 51 फीसदी प्रजातियां रहती हैं। करीब 30 प्रजातियां यूरोप, साइबेरिया और एशियाई ठंडे देशों से प्रवास पर आती हैं। शहरों के शोरगुल से पक्षियों ने अपने प्रवास क्षेत्रों में बदलाव किया है। ग्राफिक एरा विवि के पर्यावरण विज्ञान की प्रोफेसर डॉ. अर्चना बचेती का कहना है कि उत्तराखंड में पक्षियों का अनूठा संसार है। पक्षी इंसानों की आहट को बखूबी समझते हैं। राजाजी नेशनल पार्क से लेकर प्रदेश के अन्य जंगलों में उनकी चहचहाहट मन को सुकून पहुंचाती है। पर्यटक एवं बर्ड वॉचर पक्षियों को घंटों निहारने पहुंचते हैं।
इन प्रदेशों से आए हैं प्रवासी पक्षी
इन दिनों गंगा तट और तालाबों पर मध्य एशिया, मंगोलिया, चीन, साइबेरिया, कजाकिस्तान और रूस के पूर्वी क्षेत्रों से सुर्खाब, जल काग, ब्लैकविंग इसटिल्ट, रीवर लैपविंग, स्पॉटबिल्ड़ डक, वैगटेल, खंजन, सैंड पाइपर, रीवर टर्न, पलाश गल, रेड़नेप्पड़ आइबिस जैसे प्रवासी पक्षियों के झुंड दिखने लगे हैं। राजहंस भी हरिद्वार समेत कई क्षेत्रों दिख रहे हैं। कामन रोजफिंच, पिंक ब्राउडिड रोजफिंच, ब्लू रोक थ्रस पक्षी मध्य एशिया से प्रवास पर आते हैं। क्रसटेड बंटिग, येलो ब्रेस्टेड ग्रीनफिंच, रुफस बेलिड निलतावा और मरुन ओरिओल जैसे पक्षी दक्षिण भारत एवं पूर्वी हिमालयी क्षेत्रों से प्रवास के लिए आते हैं।
- जलवायु परिवर्तन और बढ़ते कंकरीट के जंगल उनके विलुप्त होने का बड़ा कारण हैं। पक्षियों के संरक्षण के लिए उनके प्राकृतिक आवासों की रक्षा एवं संरक्षण जरूरी है। सरकार और जनता दोनों को मिलकर कार्य करने की आवश्यकता है। भारतीय उपमहाद्वीप में प्रवास करने वाले पक्षी नवंबर के पहले सप्ताह में प्रवास करने आते थे लेकिन अब अक्तूबर माह में आ जाते हैं। - आशीष आर्य, बर्ड वॉचर एवं पक्षी शोध छात्र
- जंगल और खेत-खलिहान कम हो गए हैं। जंगलों में इंसानों का दखल बढ़ गया है। गौरेया और कौवे की संख्या में तेजी से कमी आ रही है। गिद्ध विलुप्त होने की कगार पर हैं। प्रवासी पक्षी भी रात्रि में एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रवास करते हैं। प्रवास के मार्ग में प्रकाश की अधिकता से पक्षियों को दिक्कत होती हैं। दिल्ली, मुंबई और महानगरों में रात्रि में प्रकाश की अधिकता होती है जिससे प्रवासी पक्षी निश्चित मार्ग को छोड़कर दूसरे मार्ग पर चले जाते हैं। - डा. दिनेश कुमार भट्ट, एमेरिटस प्रोफेसर गुरुकुल कांगड़ी विवि
पक्षी प्रवास करने से पहले हाइपोथैलेमस नामक ग्रंथि से विशेष प्रकार का स्राव उत्पन्न करते हैं। प्रवासी पक्षी की चोंच में एक प्रकार का ज्योमैग्नेटिक सेंसर उसको एक निश्चित मार्ग प्रदान करने में सहायता करता है। अधिकांश प्रवासी पक्षी रात्रि में ही यात्रा उड़ान भरते हैं। - डॉ. कमलकांत जोशी, विभागाध्यक्ष पक्षी एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग, ग्राफिक एरा विवि